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Rigveda Mandal 4 / Sukta 42 / Mantra 10

58 Sukta
10 Mantra
4/42/10
Devata- इन्द्रावरुणौ Rishi- त्रसदस्युः पौरुकुत्स्यः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
रा॒या व॒यं स॑स॒वांसो॑ मदेम ह॒व्येन॑ दे॒वा यव॑सेन॒ गावः॑। तां धे॒नुमि॑न्द्रावरुणा यु॒वं नो॑ वि॒श्वाहा॑ धत्त॒मन॑पस्फुरन्तीम् ॥१०॥

रा॒याः । व॒यम् । स॒स॒ऽवांसः॑ । म॒दे॒म॒ । ह॒व्येन॑ । दे॒वाः । यव॑सेन । गावः॑ । ताम् । धे॒नुम् । इ॒न्द्रा॒व॒रु॒णा॒ । यु॒वम् । नः॒ । वि॒श्वाहा॑ । ध॒त्त॒म् । अन॑पऽस्फुरन्तीम् ॥

Mantra without Swara
राया वयं ससवांसो मदेम हव्येन देवा यवसेन गावः। तां धेनुमिन्द्रावरुणा युवं नो विश्वाहा धत्तमनपस्फुरन्तीम् ॥

राया। वयम्। ससऽवांसः। मदेम। हव्येन। देवाः। यवसेन। गावः। ताम्। धेनुम्। इन्द्रावरुणा। युवम्। नः। विश्वाहा। धत्तम्। अनपऽस्फुरन्तीम् ॥१०॥

Ashtak » 3 Adhyay » 7 Varga » 18 Mantra » 5

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Meaning
(हव्येन) देने और ग्रहण करने योग्य वस्तु से (देवाः) विद्वान् जन (यवसेन) भूसा आदि से जैसे (गावः) गौवें वैसे (राया) धन से (वयम्) हम लोग (ससवांसः) उत्तम प्रकार शयन करते हुए से (मदेम) आनन्द करें। और हे (इन्द्रावरुणा) अध्यापक और उपदेशको ! (युवम्) आप दोनों (विश्वाहा) सब दिन (अनपस्फुरन्तीम्) दृढ़ निश्चल बुद्धि को उत्पन्न करती और (ताम्, धेनुम्) सम्पूर्ण मनोरथों को पूर्ण करती हुई उस वाणी को (नः) हम लोगों के लिये (धत्तम्) धारण कीजिये ॥१०॥
Essence
हे विद्वानो ! हम लोगों में वैसी सम्पूर्ण शास्त्रों में कहे पदार्थविषयक वाणी को स्थित करो, जिससे हम लोग सदा ही आनन्दित होवें ॥१०॥ इस सूक्त में राजा, ईश्वर, ईश्वरोपासना और विद्वानों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछिले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति है, यह जानना चाहिये ॥१०॥ यह बयालीसवाँ सूक्त और अठारहवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
अब विद्वद्विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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