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Rigveda Mandal 4 / Sukta 42 / Mantra 1

58 Sukta
10 Mantra
4/42/1
Devata- आत्मा Rishi- त्रसदस्युः पौरुकुत्स्यः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
मम॑ द्वि॒ता रा॒ष्ट्रं क्ष॒त्रिय॑स्य वि॒श्वायो॒र्विश्वे॑ अ॒मृता॒ यथा॑ नः। क्रतुं॑ सचन्ते॒ वरु॑णस्य दे॒वा राजा॑मि कृ॒ष्टेरु॑प॒मस्य॑ व॒व्रेः ॥१॥

मम॑ । द्वि॒ता । रा॒ष्ट्रम् । क्ष॒त्रिय॑स्य । वि॒श्वऽआ॑योः । विश्वे॑ । अ॒मृताः॑ । यथा॑ । नः॒ । क्रतु॑म् । स॒च॒न्ते॒ । वरु॑णस्य । दे॒वाः । राजा॑मि । कृ॒ष्टेः । उ॒प॒मस्य॑ । व॒व्रेः ॥

Mantra without Swara
मम द्विता राष्ट्रं क्षत्रियस्य विश्वायोर्विश्वे अमृता यथा नः। क्रतुं सचन्ते वरुणस्य देवा राजामि कृष्टेरुपमस्य वव्रेः ॥

मम। द्विता। राष्ट्रम्। क्षत्रियस्य। विश्वऽआयोः। विश्वे। अमृताः। यथा। नः। क्रतुम्। सचन्ते। वरुणस्य। देवाः। राजामि। कृष्टेः। उपऽमस्य। वव्रेः ॥१॥

Ashtak » 3 Adhyay » 7 Varga » 17 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे विद्वानो ! (यथा) जैसे (मम) मुझ (विश्वायोः) पूर्ण अवस्थावाले (क्षत्रियस्य) क्षत्रिय के (द्विता) दो का होना तथा (विश्वे) सम्पूर्ण (अमृताः) नाश से रहित जन (नः) हम लोगों के (राष्ट्रम्) राज्य (क्रतुम्) और बुद्धि को (सचन्ते) संबन्धयुक्त करते हैं और (वरुणस्य) श्रेष्ठ (कृष्टेः) खींचते हुए (उपमस्य) उपमायुक्त (वव्रेः) स्वीकार करनेवाले मुझ जन की बुद्धि को (देवाः) प्रकाशमान जन मेलते हैं, वैसे ही इन में मैं (राजामि) शोभित होता हूँ ॥१॥
Essence
हे मनुष्यो ! इस संसार में स्वामी और स्वम् अर्थात् अपना ये दो ही पदार्थ वर्त्तमान हैं और जिस देश में दीर्घकालपर्य्यन्त जीवने और न्याययुक्त स्वभाववाले धार्मिक मन्त्री जन सब प्रकार के गुणग्रहणकर्त्ता श्रेष्ठ उपमा से युक्त वर्त्तमान हैं, वहाँ ही रहता हुआ सज्जन सुख का अत्यन्त भोग करता है ॥१॥
Subject
अब दश ऋचावाले बयालीसवें सूक्त का प्रारम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में राजविषय को कहते हैं ॥