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Rigveda Mandal 4 / Sukta 41 / Mantra 9

58 Sukta
11 Mantra
4/41/9
Devata- इन्द्रावरुणौ Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
इ॒मा इन्द्रं॒ वरु॑णं मे मनी॒षा अग्म॒न्नुप॒ द्रवि॑णमि॒च्छमा॑नाः। उपे॑मस्थुर्जो॒ष्टार॑इव॒ वस्वो॑ र॒घ्वीरी॑व॒ श्रव॑सो॒ भिक्ष॑माणाः ॥९॥

इ॒माः । इन्द्र॑म् । वरु॑णम् । मे॒ । म॒नी॒षाः । अग्म॑न् । उप॑ । द्रवि॑णम् । इ॒च्छमा॑नाः । उप॑ । ई॒म् । अ॒स्थुः॒ । जो॒ष्टारः॑ऽइव । वस्वः॑ । र॒घ्वीःऽइ॑व । श्रव॑सः । भिक्ष॑माणाः ॥

Mantra without Swara
इमा इन्द्रं वरुणं मे मनीषा अग्मन्नुप द्रविणमिच्छमानाः। उपेमस्थुर्जोष्टारइव वस्वो रघ्वीरीव श्रवसो भिक्षमाणाः ॥

इमाः। इन्द्रम्। वरुणम्। मे। मनीषाः। अग्मन्। उप। द्रविणम्। इच्छमानाः। उप। ईम्। अस्थुः। जोष्टारःऽइव। वस्वः। रघ्वीःऽइव। श्रवसः। भिक्षमाणाः ॥९॥

Ashtak » 3 Adhyay » 7 Varga » 16 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे राजन् ! जो (इमाः) ये प्रत्यक्ष कुमारी ब्रह्मचारिणियाँ (मे) मेरी (मनीषाः) बुद्धियों के सदृश (इन्द्रम्) अत्यन्त ऐश्वर्य्य (द्रविणम्) धन वा यश और (वरुणम्) श्रेष्ठ स्वभाव की (इच्छमानाः) इच्छा करती हुई पढ़ानेवालियों को (अग्मन्) प्राप्त होवें और (जोष्टारइव) सेवा करते हुए पुरुषों के समान (वस्वः) धन के (उप, अस्थुः) समीप स्थित होती (ईम्) और प्रत्यक्ष (श्रवसः) अन्न की (रघ्वीरिव) छोटी ब्रह्मचारिणियों के सदृश (भिक्षमाणाः) याचना करती हुई पढ़ानेवाली स्त्रियों के (उप) समीप स्थित हुई वे ही कन्या अत्यन्त श्रेष्ठ होती हैं ॥९॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है । हे राजन् ! जैसे कन्याजन ब्रह्मचर्य्य से ग्रहण की गई विद्या और उत्तम शिक्षा से यशयुक्त और विद्यावाली होकर अपने अनुकूल पतियों को प्राप्त होकर सदा आनन्दित होती हैं, वैसे ही प्रजाओं के साथ आप और आपके साथ प्रजाजन निरन्तर आनन्द करें ॥९॥
Subject
अब राजा और प्रजा के कर्त्तव्य विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥