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Rigveda Mandal 4 / Sukta 41 / Mantra 8

58 Sukta
11 Mantra
4/41/8
Devata- इन्द्रावरुणौ Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- स्वराट्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
ता वां॒ धियोऽव॑से वाज॒यन्ती॑रा॒जिं न ज॑ग्मुर्युव॒यूः सु॑दानू। श्रि॒ये न गाव॒ उप॒ सोम॑मस्थु॒रिन्द्रं॒ गिरो॒ वरु॑णं मे मनी॒षाः ॥८॥

ताः । वा॒म् । धियः॑ । अव॑से । वा॒ज॒ऽयन्तीः॑ । आ॒जिम् । न । ज॒मुः॒ । यु॒व॒ऽयूः । सु॒दा॒नू॒ इति॑ सुऽदानू । श्रि॒ये । न । गावः॑ । उप॑ । सोम॑म् । अ॒स्थुः॒ । इन्द्र॑म् । गिरः॑ । वरु॑णम् । मे॒ । म॒नी॒षाः ॥

Mantra without Swara
ता वां धियोऽवसे वाजयन्तीराजिं न जग्मुर्युवयूः सुदानू। श्रिये न गाव उप सोममस्थुरिन्द्रं गिरो वरुणं मे मनीषाः ॥

ताः। वाम्। धियः। अवसे। वाजऽयन्तीः। आजिम्। न। जग्मुः। युवऽयूः। सुदानू इति सुऽदानू। श्रिये। न। गावः। उप। सोमम्। अस्थुः। इन्द्रम्। गिरः। वरुणम्। मे। मनीषाः ॥८॥

Ashtak » 3 Adhyay » 7 Varga » 16 Mantra » 3

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Meaning
हे मनुष्यो ! जैसे (मे) मेरी (गिरः) उत्तम प्रकार शिक्षित वाणियाँ और (मनीषाः) बुद्धियाँ (श्रिये) धन के लिये (गावः) पृथिवी वा गौओं के (न) सदृश (सोमम्) ऐश्वर्य्य (इन्द्रम्) अत्यन्त सुख करनेवाले (वरुणम्) श्रेष्ठ जन के (उप, अस्थुः) समीप प्राप्त होवें, वैसे ही जो (वाम्) आप दोनों की (धियः) बुद्धियाँ वा कर्म (अवसे) रक्षण आदि के लिये (वाजयन्तीः) जनाती हुई (आजिम्) संग्राम के (न) सदृश (सुदानू) उत्तम प्रकार दाता जनों को और (युवयूः) आप दोनों की कामना करते हुए प्रजाजनों को (जग्मुः) प्राप्त होवें (ता) उनका आप दोनों निरन्तर पालन करो ॥८॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है । जैसे विद्यावाली माता अपने सन्तानों को उत्तम प्रकार शिक्षा दे पालन कर और विद्या से युक्त करके सुखी करती है, वैसे ही राजा प्रजा के प्रति वर्त्ताव करे ॥८॥
Subject
फिर राजविषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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