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Rigveda Mandal 4 / Sukta 41 / Mantra 3

58 Sukta
11 Mantra
4/41/3
Devata- इन्द्रावरुणौ Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
इन्द्रा॑ ह॒ रत्नं॒ वरु॑णा॒ धेष्ठे॒त्था नृभ्यः॑ शशमा॒नेभ्य॒स्ता। यदी॒ सखा॑या स॒ख्याय॒ सोमैः॑ सु॒तेभिः॑ सुप्र॒यसा॑ मा॒दयै॑ते ॥३॥

इन्द्रा॑ । ह॒ । रत्न॑म् । वरु॑णा । धेष्ठा॑ । इ॒त्था । नृऽभ्यः॑ । श॒श॒मा॒नेभ्यः॑ । ता । यदि॑ । सखा॑या । स॒ख्याय॑ । सोमैः॑ । सु॒तेभिः॑ । सु॒ऽप्र॒यसा॑ । मा॒दयै॑ते॒ इति॑ ॥

Mantra without Swara
इन्द्रा ह रत्नं वरुणा धेष्ठेत्था नृभ्यः शशमानेभ्यस्ता। यदी सखाया सख्याय सोमैः सुतेभिः सुप्रयसा मादयैते ॥

इन्द्रा। ह। रत्नम्। वरुणा। धेष्ठा। इत्था। नृऽभ्यः। शशमानेभ्यः। ता। यदि। सखाया। सख्याय। सोमैः। सुतेभिः। सुऽप्रयसा। मादयैते। इति ॥३॥

Ashtak » 3 Adhyay » 7 Varga » 15 Mantra » 3

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Meaning
हे (धेष्ठा) धाता जनो (इन्द्रा) राजन् (वरुणा) और उत्तम गुणों से युक्त प्रधान ! (यदी) यदि जिन तुम दोनों ने (शशमानेभ्यः) प्रशंसा करते हुए (नृभ्यः) मनुष्यों के लिये (ह) ही (रत्नम्) सुन्दर धन दिया तो (ता) वे (सखाया) परस्पर मित्र आप दोनों (सख्याय) मित्रपन के लिये (सुप्रयसा) श्रेष्ठ प्रयत्न से (सुतेभिः) उत्पन्न किये गये (सोमैः) ऐश्वर्य्यों से (मादयैते) सुख को प्राप्त हों (इत्था) इस प्रकार से आप दोनों निश्चय आनन्दित हों ॥३॥
Essence
जो राजा और मन्त्रीजन उत्तम गुणवाले मनुष्यों का धन आदि से सत्कार करते हैं, वे ही ऐश्वर्य्य को प्राप्त होकर सदा आनन्दित होते हैं ॥३॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥