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Rigveda Mandal 4 / Sukta 41 / Mantra 2

58 Sukta
11 Mantra
4/41/2
Devata- इन्द्रावरुणौ Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
इन्द्रा॑ ह॒ यो वरु॑णा च॒क्र आ॒पी दे॒वौ मर्तः॑ स॒ख्याय॒ प्रय॑स्वान्। स ह॑न्ति वृ॒त्रा स॑मि॒थेषु॒ शत्रू॒नवो॑भिर्वा म॒हद्भिः॒ स प्र शृ॑ण्वे ॥२॥

इन्द्रा॑ । ह॒ । यः । वरु॑णा । च॒क्रे । आ॒पी इति॑ । दे॒वौ । मर्तः॑ । स॒ख्याय॑ । प्रय॑स्वान् । सः । ह॒न्ति॒ । वृ॒त्रा । स॒म्ऽइ॒थेषु॑ । शत्रू॑न् । अवः॑ऽभिः । वा॒ । म॒हत्ऽभिः॑ । सः । प्र । शृ॒ण्वे॒ ॥

Mantra without Swara
इन्द्रा ह यो वरुणा चक्र आपी देवौ मर्तः सख्याय प्रयस्वान्। स हन्ति वृत्रा समिथेषु शत्रूनवोभिर्वा महद्भिः स प्र शृण्वे ॥

इन्द्रा। ह। यः। वरुणा। चक्रे। आपी इति। देवौ। मर्तः। सख्याय। प्रयस्वान्। सः। हन्ति। वृत्रा। सम्ऽइथेषु। शत्रून्। अवःऽभिः। वा। महत्ऽभिः। सः। प्र। शृण्वे ॥२॥

Ashtak » 3 Adhyay » 7 Varga » 15 Mantra » 2

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Meaning
हे (इन्द्रा) अत्यन्त ऐश्वर्य्य से युक्त (वरुणा) उत्तम (आपी) सम्पूर्ण विद्याओं को प्राप्त (देवौ) विद्वान् जनो ! आप लोगों के मध्य में (यः) (प्रयस्वान्) प्रयत्न करनेवाला (मर्त्तः) मनुष्य (सख्याय) मित्रपन के लिये (प्र, चक्रे) उत्तमता करता है (सः, ह) वही (अवोभिः) रक्षण आदिकों के साथ (वा) वा (सः) वह (महद्भिः) महाशयों के साथ (समिथेषु) संग्रामों में (वृत्रा) शत्रुओं की सेनाओं और (शत्रून्) शत्रुओं का (हन्ति) नाश करता है, उसको मैं यशस्वी (शृण्वे) सुनता हूँ ॥२॥
Essence
हे न्याय करनेवाले राजा और मन्त्रीजनो ! जो आप लोगों के सत्कार करने और शत्रुओं के जीतनेवाले महाशय अर्थात् गम्भीर अभिप्रायवाले, मेलयुक्त, आप लोगों की मित्रता में प्रीतिकर्त्ता, विजयी होवें उनका सत्कार करके रक्षा करो ॥२॥
Subject
अब राजा और अमात्य विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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