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Rigveda Mandal 4 / Sukta 41 / Mantra 11

58 Sukta
11 Mantra
4/41/11
Devata- इन्द्रावरुणौ Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
आ नो॑ बृहन्ता बृह॒तीभि॑रू॒ती इन्द्र॑ या॒तं व॑रुण॒ वाज॑सातौ। यद्दि॒द्यवः॒ पृत॑नासु प्र॒क्रीळा॒न्तस्य॑ वां स्याम सनि॒तार॑ आ॒जेः ॥११॥

आ । नः॒ । बृ॒ह॒न्ता॒ । बृ॒ह॒तीभिः॑ । ऊ॒ती । इन्द्र॑ । या॒तम् । व॒रु॒ण॒ । वाज॑ऽसातौ । यत् । दि॒द्यवः॑ । पृत॑नासु । प्र॒ऽक्रीळा॑न् । तस्य॑ । वाम् । स्या॒म॒ । स॒नि॒तारः॑ । ओ॒जः ॥

Mantra without Swara
आ नो बृहन्ता बृहतीभिरूती इन्द्र यातं वरुण वाजसातौ। यद्दिद्यवः पृतनासु प्रक्रीळान्तस्य वां स्याम सनितार आजेः ॥

आ। नः। बृहन्ता। बृहतीभिः। ऊती। इन्द्र। यातम्। वरुण। वाजऽसातौ। यत्। दिद्यवः। पृतनासु। प्रऽकीळान्। तस्य। वाम्। स्याम। सनितारः। आजेः ॥११॥

Ashtak » 3 Adhyay » 7 Varga » 16 Mantra » 6

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Meaning
हे (इन्द्र) दुष्टों के दलन करनेवाले राजन् और (वरुण) सेना के ईश ! (बृहन्ता) श्रेष्ठ गुणों से बड़े आप दोनों (बृहतीभिः) बड़ी (ऊती) रक्षा आदिकों से (वाजसातौ) सङ्ग्राम में (नः) हम लोगों को (आ) सब ओर से (यातम्) प्राप्त हूजिये (यत्) जो (दिद्यवः) विद्या और विनय से प्रकाशमान तेजस्वी (तस्य) उस (आजेः) सङ्ग्राम के (सनितारः) विभाग करनेवाले हम (पृतनासु) सेनाओं में (प्रक्रीळान्) उत्तम क्रीड़ा अर्थात् विहारों को प्राप्त होकर (वाम्) आप दोनों से विहार को प्राप्त हुए (स्याम) होवें, उन हम लोगों का आप दोनों सत्कार करें ॥११॥
Essence
हे राजन् ! जैसे हम लोग आपके प्रति प्रीति से वर्त्ताव करें, वैसा ही आपको भी चाहिये कि हम लोगों में वर्त्ताव करें ॥११॥ इस सूक्त में अध्यापक, उपदेशक, राजा, प्रजा और मन्त्री के कृत्य का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछिले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥११॥ यह इकतालीसवाँ सूक्त और सोलहवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
फिर राजप्रजाविषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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