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Rigveda Mandal 4 / Sukta 41 / Mantra 10

58 Sukta
11 Mantra
4/41/10
Devata- इन्द्रावरुणौ Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- स्वराट्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
अश्व्य॑स्य॒ त्मना॒ रथ्य॑स्य पु॒ष्टेर्नित्य॑स्य रा॒यः पत॑यः स्याम। ता च॑क्रा॒णा ऊ॒तिभि॒र्नव्य॑सीभिरस्म॒त्रा रायो॑ नि॒युतः॑ सचन्ताम् ॥१०॥

अश्व्य॑स्य । त्मना॑ । रथ्य॑स्य । पु॒ष्टेः । नित्य॑स्य । रा॒यः । पत॑यः । स्या॒म॒ । ता । च॒क्रा॒णौ । ऊ॒तिऽभिः॑ । नव्य॑सीभिः । अ॒स्म॒ऽत्रा । रायः॑ । नि॒ऽयुतः॑ । स॒च॒न्ता॒म् ॥

Mantra without Swara
अश्व्यस्य त्मना रथ्यस्य पुष्टेर्नित्यस्य रायः पतयः स्याम। ता चक्राणा ऊतिभिर्नव्यसीभिरस्मत्रा रायो नियुतः सचन्ताम् ॥

अश्व्यस्य। त्मना। रथ्यस्य। पुष्टेः। नित्यस्य। रायः। पतयः। स्याम। ता। चक्राणौ। ऊतिऽभिः। नव्यसीभिः। अस्मऽत्रा। रायः। निऽयुतः। सचन्ताम् ॥१०॥

Ashtak » 3 Adhyay » 7 Varga » 16 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! जैसे (ता) वे (चक्राणौ) करते हुए दो जन (नव्यसीभिः) नवीन (ऊतिभिः) रक्षा आदि कर्मों से (अस्मत्रा) हम लोगों में वर्त्तमान (रायः) धन के सम्बन्ध को प्राप्त होवें और (नियुतः) निश्चययुक्त पदार्थ (सचन्ताम्) सम्बद्ध होवें, वैसे हम लोग (त्मना) आत्मा से अपने (अश्व्यस्य) शीघ्र चलनेवालों में उत्पन्न हुए (रथ्यस्य) रमण करने योग्य वाहनों में श्रेष्ठ (पुष्टेः) पुष्टि के सम्बन्ध में (नित्यस्य) नित्य वर्त्तमान (रायः) धन के (पतयः) स्वामी (स्थाम) होवें ॥१०॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को चाहिये कि जैसे युक्त अर्थात् कार्य में लगे हुए पुरुष सम्पूर्ण ऐश्वर्य्य को प्राप्त होते हैं, वैसे हम लोग सम्पूर्ण आनन्द को प्राप्त होवें, ऐसी इच्छा करें ॥१०॥
Subject
अब प्रजा विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥