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Rigveda Mandal 4 / Sukta 41 / Mantra 1

58 Sukta
11 Mantra
4/41/1
Devata- इन्द्रावरुणौ Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
इन्द्रा॒ को वां॑ वरुणा सु॒म्नमा॑प॒ स्तोमो॑ ह॒विष्माँ॑ अ॒मृतो॒ न होता॑। यो वां॑ हृ॒दि क्रतु॑माँ अ॒स्मदु॒क्तः प॒स्पर्श॑दिन्द्रावरुणा॒ नम॑स्वान् ॥१॥

इन्द्रा॑ । कः । वा॒म् । व॒रु॒णा॒ । सु॒म्नम् । आ॒प॒ । स्तोमः॑ । ह॒विष्मा॑न् । अ॒मृतः॑ । न । होता॑ । यः । वा॒म् । हृ॒दि । क्रतु॑ऽमान् । अ॒स्मत् । उ॒क्तः । प॒स्पर्श॑त् । इ॒न्द्रा॒व॒रु॒णा॒ । नम॑स्वान् ॥

Mantra without Swara
इन्द्रा को वां वरुणा सुम्नमाप स्तोमो हविष्माँ अमृतो न होता। यो वां हृदि क्रतुमाँ अस्मदुक्तः पस्पर्शदिन्द्रावरुणा नमस्वान् ॥

इन्द्रा। कः। वाम्। वरुणा। सुम्नम्। आप। स्तोमः। हविष्मान्। अमृतः। न। होता। यः। वाम्। हृदि। क्रतुऽमान्। अस्मत्। उक्तः। पस्पर्शत्। इन्द्रावरुणा। नमस्वान् ॥१॥

Ashtak » 3 Adhyay » 7 Varga » 15 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे (इन्द्रा) अत्यन्त ऐश्वर्य्य से युक्त (वरुणा) श्रेष्ठ आचरण करनेवाले अध्यापक और उपदेशक जन ! (वाम्) तुम दोनों से (कः) कौन (स्तोमः) प्रशंसा (सुम्नम्) सुख को (हविष्मान्) बहुत पदार्थों में कारण (अमृतः) नाश से रहित और (होता) दाता जन के (न) सदृश (आप) प्राप्त होवे। हे (इन्द्रावरुणा) प्राण और उदान वायु के सदृश प्रियबली जनो ! (यः) जो (अस्मत्) हम लोगों से (उक्तः) कहा गया (नमस्वान्) बहुत अन्न आदि वा सत्करणों युक्त (क्रतुमान्) बहुत श्रेष्ठ बुद्धिवाला (वाम्) आप दोनों के (हृदि) हृदय में (पस्पर्शत्) स्पर्श करे ॥१॥
Essence
हे अध्यापक और उपदेशको ! जो दाता जन के सदृश पुरुषार्थी, बुद्धिमान्, नम्र, शान्त, सत्कार करनेवाले और माता-पिता से उत्तम प्रकार शिक्षित होवें, उनको पढ़ा और उपदेश देकर लक्ष्मीयुक्त और श्रेष्ठ करो ॥१॥
Subject
अब ग्यारह ऋचावाले इकतालीसवें सूक्त का आरम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में अध्यापक और उपदेशक के विषय को कहते हैं ॥