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Rigveda Mandal 4 / Sukta 39 / Mantra 2

58 Sukta
6 Mantra
4/39/2
Devata- दध्रिकाः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- स्वराट्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
म॒हश्च॑र्क॒र्म्यर्व॑तः क्रतु॒प्रा द॑धि॒क्राव्णः॑ पुरु॒वार॑स्य॒ वृष्णः॑। यं पू॒रुभ्यो॑ दीदि॒वांसं॒ नाग्निं द॒दथु॑र्मित्रावरुणा॒ ततु॑रिम् ॥२॥

म॒हः । च॒र्क॒र्मि॒ । अर्व॑तः । क्र॒तु॒ऽप्राः । द॒धि॒ऽक्राव्णः॑ । पु॒रु॒ऽवार॑स्य । वृष्णः॑ । यम् । पू॒रुऽभ्यः॑ । दी॒दि॒ऽवांसम् । न । अ॒ग्निम् । द॒दथुः॑ । मि॒त्रा॒व॒रु॒णा॒ । ततु॑रिम् ॥

Mantra without Swara
महश्चर्कर्म्यर्वतः क्रतुप्रा दधिक्राव्णः पुरुवारस्य वृष्णः। यं पूरुभ्यो दीदिवांसं नाग्निं ददथुर्मित्रावरुणा ततुरिम् ॥

महः। चर्कर्मि। अर्वतः। क्रतुऽप्राः। दधिऽक्राव्णः। पुरुऽवारस्य। वृष्णः। यम्। पूरुऽभ्यः। दीदिऽवांसम्। न। अग्निम्। ददथुः। मित्रावरुणा। ततुरिम् ॥२॥

Ashtak » 3 Adhyay » 7 Varga » 13 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे (मित्रावरुणा) प्राण और उदान वायु के सदृश वर्त्तमान सभा और सेना के ईश आप दो जन (पूरुभ्यः) बहुतों से (यम्) जिस (ततुरिम्) शीघ्रता करते हुए (दीदिवांसम्) प्रकाशमान (अग्निम्) अग्नि के (न) सदृश विनय को (ददथुः) देते हैं उस (पुरुवारस्य) बहुत श्रेष्ठ जनों से स्वीकार किय गये और (दधिक्राव्णः) विद्या की धारणा करनेवालों की कामना करने और (वृष्णः) सुखों के वर्षानेवाले के जो (क्रतुप्राः) बुद्धि के पूर्ण करनेवाले उन (महः) बड़े (अर्वतः) घोड़ों के सदृशों को और कार्य्य को मैं (चर्कर्मि) निरन्तर करता हूँ ॥२॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है । जो राजा बुद्धिवाले और बुद्धि के देनेवालों को सदा धारण करता है, वह सूर्य्य के सदृश प्रतापी होता हुआ शीघ्र अपने कार्य्य को सिद्ध कर सकता है ॥२॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥