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Rigveda Mandal 4 / Sukta 39 / Mantra 1

58 Sukta
6 Mantra
4/39/1
Devata- दध्रिकाः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
आ॒शुं द॑धि॒क्रां तमु॒ नु ष्ट॑वाम दि॒वस्पृ॑थि॒व्या उ॒त च॑र्किराम। उ॒च्छन्ती॒र्मामु॒षसः॑ सूदय॒न्त्वति॒ विश्वा॑नि दुरि॒तानि॑ पर्षन् ॥१॥

आ॒शुम् । द॒धि॒ऽक्राम् । तम् । ऊँ॒ इति॑ । नु । स्त॒वा॒म॒ । दि॒वः । पृ॒थि॒व्याः । उ॒त । च॒र्कि॒रा॒म॒ । उ॒च्छन्तीः॑ । माम् । उ॒षसः॑ । सू॒द॒य॒न्तु॒ । अति॑ । विश्वा॑नि । दुः॒ऽइ॒तानि॑ । प॒र्ष॒न् ॥

Mantra without Swara
आशुं दधिक्रां तमु नु ष्टवाम दिवस्पृथिव्या उत चर्किराम। उच्छन्तीर्मामुषसः सूदयन्त्वति विश्वानि दुरितानि पर्षन् ॥

आशुम्। दधिऽक्राम्। तम्। ऊम् इति। नु। स्तवाम। दिवः। पृथिव्याः। उत। चर्किराम। उच्छन्तीः। माम्। उषसः। सूदयन्तु। अति। विश्वानि। दुःऽइतानि। पर्षन् ॥१॥

Ashtak » 3 Adhyay » 7 Varga » 13 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हम लोग (दिवः) प्रकाश और (पृथिव्याः) भूमि के मध्य में (तम्) उस (आशुम्) शीघ्र चलनेवाले (दधिक्राम्) धारण करने योग्य को धारण करनेवाले की (नु) तर्क वितर्क के साथ (स्तवाम) प्रशंसा करें (उत) और शत्रुओं को (उ) भी (चर्किराम) निरन्तर फैकें और जो (माम्) मुझको (पर्षन्) सीचें उनकी (उच्छन्तीः) सेवा करती हुई (उषसः) प्रभात वेला (विश्वानि) सम्पूर्ण (दुरितानि) दुःखों वा दुष्टाचरणों को (अति, सूदयन्तु) अत्यन्त दूर करें ॥१॥
Essence
जो राजा हम लोगों के दुःखों को दूर करके जैसे प्रातःकाल अन्धकार को वैसे अन्याय और दुष्टों का निषेध करता है, उसी की हम लोग प्रशंसा करें ॥१॥
Subject
अब छः ऋचावाले उनतालीसवें सूक्त का आरम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में कैसा राजा हो, इस विषय को कहते हैं ॥