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Rigveda Mandal 4 / Sukta 38 / Mantra 5

58 Sukta
10 Mantra
4/38/5
Devata- दध्रिकाः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
उ॒त स्मै॑नं वस्त्र॒मथिं॒ न ता॒युमनु॑ क्रोशन्ति क्षि॒तयो॒ भरे॑षु। नी॒चाय॑मानं॒ जसु॑रिं॒ न श्ये॒नं श्रव॒श्चाच्छा॑ पशु॒मच्च॑ यू॒थम् ॥४॥

उ॒त । स्म॒ । ए॒न॒म् । व॒स्त्र॒ऽमथि॑म् । न । ता॒युम् । अनु॑ । क्रो॒श॒न्ति॒ । क्षि॒तयः॑ । भरे॑षु । नी॒चा । अय॑मानम् । जसु॑रिम् । न । श्ये॒नम् । श्रवः॑ । च॒ । अच्छ॑ । प॒शु॒ऽमत् । च॒ । यू॒थम् ॥

Mantra without Swara
उत स्मैनं वस्त्रमथिं न तायुमनु क्रोशन्ति क्षितयो भरेषु। नीचायमानं जसुरिं न श्येनं श्रवश्चाच्छा पशुमच्च यूथम् ॥

उत। स्म। एनम्। वस्त्रऽमथिम्। न। तायुम्। अनु। क्रोशन्ति। क्षितयः। भरेषु। नीचा। अयमानम्। जसुरिम्। न। श्येनम्। श्रवः। च। अच्छ। पशुऽमत्। च। यूथम् ॥५॥

Ashtak » 3 Adhyay » 7 Varga » 11 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
(क्षितयः) मनुष्य (भरेषु) संग्रामों में जिस (एनम्) इस राजा को (वस्त्रमथिम्) वस्त्रों को मथनेवाले (तायुम्) चोर को (न) जैसे वैसे (अनु, क्रोशन्ति) पीछे कोशते रोते हैं (जसुरिम्) प्रयत्न करते हुए (श्येनम्) पक्षिविशेष अर्थात् वाज के (न) सदृश (नीचा) नीच कर्मों को (अयमानम्) प्राप्त होनेवाले को और (पशुमत्) पशुओं से युक्त (श्रवः) अन्न वा श्रवण को (च) भी (अच्छ) उत्तम प्रकार (यूथम्, च) तथा समूह के पीछे कोशते रोते हैं (उत, स्म) वही तो शीघ्र नष्ट होता है ॥५॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है । जो राजा प्रजापालन के विना कर लेता है, जिस राजा की प्रजा को दुष्ट जन दुःख देते हैं और जो राजा आप नीच कर्म करनेवाला, वाज पक्षी के सदृश हिंसक, पशु के सदृश मूर्ख और जिस राजा की सेना चोर के सदृश वर्त्तमान है, उसका शीघ्र विनाश होता है, यह निश्चय है ॥५॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥