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Rigveda Mandal 4 / Sukta 37 / Mantra 8

58 Sukta
8 Mantra
4/37/8
Devata- ऋभवः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
तं नो॑ वाजा ऋभुक्षण॒ इन्द्र॒ नास॑त्या र॒यिम्। समश्वं॑ चर्ष॒णिभ्य॒ आ पु॒रु श॑स्त म॒घत्त॑ये ॥८॥

तम् । नः॒ । वा॒जाः॒ । ऋ॒भु॒क्ष॒णः॒ । इन्द्र॑ । नास॑त्या । र॒यिम् । सम् । अश्व॑म् । च॒र्ष॒णिऽभ्यः॑ । आ । पु॒रु । श॒स्त॒ । म॒घत्त॑ये ॥

Mantra without Swara
तं नो वाजा ऋभुक्षण इन्द्र नासत्या रयिम्। समश्वं चर्षणिभ्य आ पुरु शस्त मघत्तये ॥

तम्। नः। वाजाः। ऋभुक्षणः। इन्द्र। नासत्या। रयिम्। सम्। अश्वम्। चर्षणिऽभ्यः। आ। पुरु। शस्त। मघत्तये ॥८॥

Ashtak » 3 Adhyay » 7 Varga » 10 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे (वाजाः) देनेवाले ! (ऋभुक्षणः) बड़े ! आप लोग जैसे (नासत्या) असत्याचार से रहित सभा और न्याय के ईश वैसे (नः) हम (चर्षणिभ्यः) मनुष्यों के अर्थ (मघत्तये) श्रेष्ठ धन की प्राप्ति के लिये (तम्) उस (अश्वम्) बड़े (रयिम्) धन को (पुरु) बहुत (सम्) उत्तम प्रकार (आ) ग्रहण करिये। और हे (इन्द्र) अत्यन्त ऐश्वर्य्य से युक्त ! आप इन लोगों की (शस्त) प्रशंसा कीजिये ॥८॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को चाहिये कि राजा और राजपुरुषों से धन की उन्नति सदा करें, जिससे बहुत प्रकार का सुख होवे ॥८॥ इस सूक्त में विद्वानों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछिले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥८॥ यह सैंतीसवाँ सूक्त और दशवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥