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Rigveda Mandal 4 / Sukta 37 / Mantra 5

58 Sukta
8 Mantra
4/37/5
Devata- ऋभवः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
ऋ॒भुमृ॑भुक्षणो र॒यिं वाजे॑ वा॒जिन्त॑मं॒ युज॑म्। इन्द्र॑स्वन्तं हवामहे सदा॒सात॑मम॒श्विन॑म् ॥५॥

ऋ॒भुम् । ऋ॒भु॒क्ष॒णः॒ । र॒यिम् । वाजे॑ । वा॒जिन्ऽत॑मम् । युज॑म् । इन्द्र॑स्वन्तम् । ह॒वा॒म॒हे॒ । स॒दा॒ऽसात॑मम् । अ॒श्विन॑म् ॥

Mantra without Swara
ऋभुमृभुक्षणो रयिं वाजे वाजिन्तमं युजम्। इन्द्रस्वन्तं हवामहे सदासातममश्विनम् ॥

ऋभुम्। ऋभुक्षणः। रयिम्। वाजे। वाजिन्ऽतमम्। युजम्। इन्द्रस्वन्तम्। हवामहे। सदाऽसातमम्। अश्विनम् ॥५॥

Ashtak » 3 Adhyay » 7 Varga » 9 Mantra » 5

Bhashya

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Meaning
हे (ऋभुक्षणः) बड़े विद्वान् ! आप लोग (वाजे) संग्राम में (ऋभुम्) बुद्धिमान् (वाजिन्तमम्) प्रशंसित अतीव बहुत घोड़ों से युक्त (युजम्) समाधान करने को योग्य (इन्द्रस्वन्तम्) अत्यन्त ऐश्वर्य्य से युक्त स्वामी के सहित (सदासातमम्) सदा अतिशय करके विभाग करने योग्य (अश्विनम्) बहुत उत्तम घोड़े आदि से युक्त (रयिम्) धन को हम लोग (हवामहे) ग्रहण करते हैं, वैसे ही इसको आप लोग बुलावें ग्रहण करें ॥५॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! आप लोग स्पर्द्धा से परस्पर बल बढ़ाय के सङ्ग्राम में शत्रुओं को जीतो ॥५॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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