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Rigveda Mandal 4 / Sukta 37 / Mantra 3

58 Sukta
8 Mantra
4/37/3
Devata- ऋभवः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
त्र्यु॒दा॒यं दे॒वहि॑तं॒ यथा॑ वः॒ स्तोमो॑ वाजा ऋभुक्षणो द॒दे वः॑। जु॒ह्वे म॑नु॒ष्वदुप॑रासु वि॒क्षु यु॒ष्मे सचा॑ बृ॒हद्दि॑वेषु॒ सोम॑म् ॥३॥

त्रि॒ऽउ॒दा॒यम् । दे॒वऽहि॑तम् । वः॒ । स्तोमः॑ । वा॒जाः॒ । ऋ॒भु॒क्ष॒णः॒ । द॒दे । वः॒ । जु॒ह्वे । म॒नु॒ष्वत् । उप॑रासु । वि॒क्षु । यु॒ष्मे इति॑ । सचा॑ । बृ॒हत्ऽदि॑वेषु । सोम॑म् ॥

Mantra without Swara
त्र्युदायं देवहितं यथा वः स्तोमो वाजा ऋभुक्षणो ददे वः। जुह्वे मनुष्वदुपरासु विक्षु युष्मे सचा बृहद्दिवेषु सोमम् ॥

त्रिऽउदायम्। देवऽहितम्। यथा। वः। स्तोमः। वाजाः। ऋभुक्षणः। ददे। वः। जुह्वे। मनुष्वत्। उपरासु। विक्षु। युष्मे इति। सचा। बृहत्ऽदिवेषु। सोमम् ॥३॥

Ashtak » 3 Adhyay » 7 Varga » 9 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे (वाजाः) अन्न तथा विज्ञानवाले (ऋभुक्षणः) श्रेष्ठ जनो ! (यथा) जैसे (वः) आप लोगों की वा आप लोगों के लिये (स्तोमः) प्रशंसा मुझको सुख देती है, वैसे आप लोगों के लिये आनन्द को मैं (ददे) देता हूँ और जैसे मैं (मनुष्वत्) विद्वान् के सदृश (वः) आप लोगों को (उपरासु) श्रेष्ठ (विक्षु) मनुष्य आदि प्रजाओं में (सचा) सत्य से (बृहद्दिवेषु) महान् दिव्य पदार्थों में (त्र्युदायम्) मन, देह और वचन इन तीनों से जिसको देते हैं उस (देवहितम्) विद्वानों के लिये हितकारक (सोमम्) ऐश्वर्य्य को (जुह्वे) स्पर्द्धा करता हूँ और (युष्मे) आप लोगों के लिये सुख देता हूँ, वैसे मुझको आप लोग भी बुलाओ और सुख दो ॥३॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है । हे मनुष्यो ! जैसे विद्वान् जन आप लोगों के लिये सुख देते हैं और आप लोगों के हित की इच्छा करते हैं, वैसे ही आप लोग भी उनके लिये आचरण करो ॥३॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥