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Rigveda Mandal 4 / Sukta 36 / Mantra 5

58 Sukta
9 Mantra
4/36/5
Devata- ऋभवः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- विराड्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
ऋ॒भु॒तो र॒यिः प्र॑थ॒मश्र॑वस्तमो॒ वाज॑श्रुतासो॒ यमजी॑जन॒न्नरः॑। वि॒भ्व॒त॒ष्टो वि॒दथे॑षु प्र॒वाच्यो॒ यं दे॑वा॒सोऽव॑था॒ स विच॑र्षणिः ॥५॥

ऋ॒भु॒तः । र॒यिः । प्र॒थ॒मश्र॑वःऽतमः । वाज॑ऽश्रुतासः । यम् । अजी॑जनन् । नरः॑ । वि॒भ्व॒ऽत॒ष्टः । वि॒दथे॑षु । प्र॒ऽवाच्यः॑ । यम् । दे॒वा॒सः । अव॑थ । सः । विऽच॑र्षणिः ॥

Mantra without Swara
ऋभुतो रयिः प्रथमश्रवस्तमो वाजश्रुतासो यमजीजनन्नरः। विभ्वतष्टो विदथेषु प्रवाच्यो यं देवासोऽवथा स विचर्षणिः ॥

ऋभुतः। रयिः। प्रथमश्रवःऽतमः। वाजऽश्रुतासः। यम्। अजीजनन्। नरः। विभ्वऽतष्टः। विदथेषु। प्रऽवाच्यः। यम्। देवासः। अवथ। सः। विऽचर्षणिः ॥५॥

Ashtak » 3 Adhyay » 7 Varga » 7 Mantra » 5

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Meaning
हे (देवासः) विद्वानो ! जो (वाजश्रुतासः) विज्ञान के सुननेवाले (नरः) नायकजन (यम्) जिसको (अजीजनन्) उत्पन्न करते हैं (सः) वह (विभ्वतष्टः) व्यापक पदार्थों में नहीं पण्डित अर्थात् उनको नहीं जाननेवाला (विदथेषु) जनाने योग्य व्यवहारों में (प्रवाच्यः) कहने के योग्य होवे इससे (ऋभुतः) बुद्धिमानों के समीप से (प्रथमश्रवस्तमः) अत्यन्त प्रथम श्रवण वा अन्न जिससे वह (रयिः) धन प्राप्त होवे और (यम्) जिसकी आप लोग (अवथ) रक्षा करते हो वह (विचर्षणिः) सम्पूर्ण देखने योग्य पदार्थों को देखनेवाला मनुष्य होवे ॥५॥
Essence
वे ही विद्वान् उत्तम हैं कि जो विद्यार्थियों को विद्वान् करते हैं, उन्हीं को पढ़ाना और उपदेश देना चाहिये जो पदार्थविद्या से रहित होवें, वे ही सुखी होते हैं, जो विद्या और धन को प्राप्त होकर धर्मात्मा होवें ॥५॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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