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Rigveda Mandal 4 / Sukta 36 / Mantra 1

58 Sukta
9 Mantra
4/36/1
Devata- ऋभवः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- स्वराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अ॒न॒श्वो जा॒तो अ॑नभी॒शुरु॒क्थ्यो॒३॒॑ रथ॑स्त्रिच॒क्रः परि॑ वर्तते॒ रजः॑। म॒हत्तद्वो॑ दे॒व्य॑स्य प्र॒वाच॑नं॒ द्यामृ॑भवः पृथि॒वीं यच्च॒ पुष्य॑थ ॥१॥

अ॒न॒श्वः । जा॒तः । अ॒न॒भी॒शुः । उ॒क्थ्यः॑ । रथः॑ । त्रि॒ऽच॒क्रः । परि॑ । व॒र्त॒ते॒ । रजः॑ । म॒हत् । तत् । वः॒ । दे॒व्य॑स्य । प्र॒ऽवाच॑नम् । द्याम् । ऋ॒भ॒वः॒ । पृ॒थि॒वीम् । यत् । च॒ । पुष्य॑थ ॥

Mantra without Swara
अनश्वो जातो अनभीशुरुक्थ्यो३ रथस्त्रिचक्रः परि वर्तते रजः। महत्तद्वो देव्यस्य प्रवाचनं द्यामृभवः पृथिवीं यच्च पुष्यथ ॥

अनश्वः। जातः। अनभीशुः। उक्थ्यः। रथः। त्रिऽचक्रः। परि। वर्तते। रजः। महत्। तत्। वः। देव्यस्य। प्रऽवाचनम्। द्याम्। ऋभवः। पृथिवीम्। यत्। च। पुष्यथ ॥१॥

Ashtak » 3 Adhyay » 7 Varga » 7 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे (ऋभवः) बुद्धिमानो ! (वः) आप लोगों के लिये (अनश्वः) घोड़ों से रहित (अनभीशुः) जिसने किसी का दिया नहीं लिया वह (उक्थ्यः) प्रशंसा करने योग्य (त्रिचक्रः) तीन पहियों से युक्त (रथः) वाहनविशेष (जातः) उत्पन्न हुआ (यत्) जो (महत्) बड़े (रजः) लोकसमूह के (परि) सब ओर (वर्तते) वर्त्तमान है (तत्) वह (देव्यस्य) विद्वानों में उत्पन्न कर्म का (प्रवाचनम्) उपदेश सब ओर वर्त्तमान है, उससे (द्याम्) प्रकाश (च) और (पृथिवीम्) अन्तरिक्ष वा भूमि को आप लोग (पुष्यथ) पुष्ट करो ॥१॥
Essence
हे मनुष्यो ! तुम लोग अनेक प्रकार के अनेक कलाचक्रों तथा पशु घोड़ा के वाहन से रहित, अग्नि और जल से चलाये गये विमान आदि वाहनों को बना पृथिवी, जलों और अन्तरिक्ष में जा आकर और ऐश्वर्य्य को प्राप्त होकर पूर्ण सुखवाले होओ ॥१॥
Subject
अब नव ऋचावाले छत्तीसवें सूक्त का आरम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में शिल्पविद्या के विषय को कहते हैं ॥