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Rigveda Mandal 4 / Sukta 35 / Mantra 9

58 Sukta
9 Mantra
4/35/9
Devata- ऋभवः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
यत्तृ॒तीयं॒ सव॑नं रत्न॒धेय॒मकृ॑णुध्वं स्वप॒स्या सु॑हस्ताः। तदृ॑भवः॒ परि॑षिक्तं व ए॒तत्सं मदे॑भिरिन्द्रि॒येभिः॑ पिबध्वम् ॥९॥

यत् । तृ॒तीय॑म् । सव॑नम् । र॒त्न॒ऽधेय॑म् । अकृ॑णुध्वम् । सु॒ऽअ॒प॒स्या । सु॒ऽह॒स्ताः॒ । तत् । ऋ॒भ॒वः॒ । परि॑ऽसिक्तम् । वः॒ । ए॒तत् । सम् । मदे॑भिः । इ॒न्द्रि॒येभिः॑ । पि॒ब॒ध्व॒म् ॥

Mantra without Swara
यत्तृतीयं सवनं रत्नधेयमकृणुध्वं स्वपस्या सुहस्ताः। तदृभवः परिषिक्तं व एतत्सं मदेभिरिन्द्रियेभिः पिबध्वम् ॥

यत्। तृतीयम्। सवनम्। रत्नऽधेयम्। अकृणुध्वम्। सुऽअपस्या। सुऽहस्ताः। तत्। ऋभवः। परिऽसिक्तम्। वः। एतत्। सम्। मदेभिः। इन्द्रियेभिः। पिबध्वम् ॥९॥

Ashtak » 3 Adhyay » 7 Varga » 6 Mantra » 4

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Meaning
हे (सुहस्ताः) सुन्दर धर्म्मसम्बन्धी कर्म्म करनेवाले हाथों से युक्त (ऋभवः) बुद्धिमानो ! आप (यत्) जो (वः) आप लोगों के लिये (एतत्) यह (परिषिक्तम्) सब प्रकार श्रेष्ठ पदार्थों से संयुक्त किया हुआ (तत्) उसको (मदेभिः) आनन्दों (इन्द्रियेभिः) चक्षुरादि इन्द्रियों और (स्वपस्या) उत्तम धर्मसम्बन्धी कर्म की इच्छा से (सम्, पिबध्वम्) पान करो और (रत्नधेयम्) जिसमें रत्न धरे जाते हैं उस (तृतीयम्) तीसरे अर्थात् अड़तालीसवें वर्ष पर्य्यन्त सेवित ब्रह्मचर्य्य और (सवनम्) सम्पूर्ण ऐश्वर्य्यों के प्राप्त करनेवाले कर्म को (अकृणुध्वम्) करिये ॥९॥
Essence
हे मनुष्यो ! तुम प्रथम अर्थात् युवावस्था में विद्या का अभ्यास, द्वितीय अर्थात् मध्यम अवस्था में गृहाश्रम और तृतीय में न्याय आदि कर्मों का अनुष्ठान करके पूर्ण ऐश्वर्य्य को प्राप्त होओ ॥९॥ इस सूक्त में विद्वानों का कृत्य वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की पिछिले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥९॥ यह पैंतीसवाँ सूक्त और छठा वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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