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Rigveda Mandal 4 / Sukta 35 / Mantra 4

58 Sukta
9 Mantra
4/35/4
Devata- ऋभवः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
किं॒मयः॑ स्विच्चम॒स ए॒ष आ॑स॒ यं काव्ये॑न च॒तुरो॑ विच॒क्र। अथा॑ सुनुध्वं॒ सव॑नं॒ मदा॑य पा॒त ऋ॑भवो॒ मधु॑नः सो॒म्यस्य॑ ॥४॥

कि॒म्ऽमयः॑ । स्वि॒त् । च॒म॒सः । ए॒षः । आ॒स॒ । यम् । काव्ये॑न । च॒तुरः॑ । वि॒ऽच॒क्र । अथ॑ । सु॒नु॒ध्व॒म् । सव॑नम् । मदा॑य । पा॒त । ऋ॒भ॒वः॒ । मधु॑नः । सो॒म्यस्य॑ ॥

Mantra without Swara
किंमयः स्विच्चमस एष आस यं काव्येन चतुरो विचक्र। अथा सुनुध्वं सवनं मदाय पात ऋभवो मधुनः सोम्यस्य ॥

किम्ऽमयः। स्वित्। चमसः। एषः। आस। यम्। काव्येन। चतुरः। विऽचक्र। अथ। सुनुध्वम्। सवनम्। मदाय। पात। ऋभवः। मधुनः। सोम्यस्य ॥४॥

Ashtak » 3 Adhyay » 7 Varga » 5 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे (ऋभवः) बुद्धिमानो ! (एषः) यह (चमसः) यज्ञपात्र जिससे कि आचमन करता है (स्वित्) सो क्या (किंमयः) किसी को फेंकता (आस) हुआ है (यम्) जिसको (काव्येन) कवियों के बनाये गये कर्म से (चतुरः) चार भाग आप लोग (विचक्र) विधान करते हैं और (मदाय) आनन्द के लिये (मधुनः) ज्ञान से उत्पन्न (सोमस्य) ऐश्वर्य्य में श्रेष्ठ पदार्थ के (सवनम्) कार्य्य की सिद्धि करनेवाले को (सुनुध्वम्) उत्पन्न करो (अथ) इसके अनन्तर इसकी (पात) रक्षा करो ॥४॥
Essence
कार्य्यों के साधन कैसे और काहे के बने हुए होते हैं, यह पूछा जाता है। जो-जो विद्या और युक्ति से बनाया गया हो, वह-वह साधन कार्य्य की सिद्धि करनेवाला होता है, यह उत्तर है ॥४॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥