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Rigveda Mandal 4 / Sukta 35 / Mantra 3

58 Sukta
9 Mantra
4/35/3
Devata- ऋभवः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- भुरिक्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
व्य॑कृणोत चम॒सं च॑तु॒र्धा सखे॒ वि शि॒क्षेत्य॑ब्रवीत। अथै॑त वाजा अ॒मृत॑स्य॒ पन्थां॑ ग॒णं दे॒वाना॑मृभवः सुहस्ताः ॥३॥

वि । अ॒कृ॒णो॒त॒ । च॒म॒सम् । च॒तुः॒ऽधा । सखे॑ । वि । शि॒क्ष॒ । इति॑ । अ॒ब्र॒वी॒त॒ । अथ॑ । ऐ॒त॒ । वा॒जाः॒ । अ॒मृत॑स्य । पन्था॑म् । ग॒णम् । दे॒वाना॑म् । ऋ॒भ॒वः॒ । सु॒ऽह॒स्ताः॒ ॥

Mantra without Swara
व्यकृणोत चमसं चतुर्धा सखे वि शिक्षेत्यब्रवीत। अथैत वाजा अमृतस्य पन्थां गणं देवानामृभवः सुहस्ताः ॥

वि। अकृणोत। चमसम्। चतुःऽधा। सखे। वि। शिक्ष। इति। अब्रवीत। अथ। ऐत। वाजाः। अमृतस्य। पन्थाम्। गणम्। देवानाम्। ऋभवः। सुऽहस्ताः ॥३॥

Ashtak » 3 Adhyay » 7 Varga » 5 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे (सखे) मित्र ! जैसे यथार्थवक्ता विद्वान् जन सत्यविद्या की शिक्षा देते हैं, वैसे आप (शिक्ष) शिक्षा देओ और हे (वाजाः) विज्ञानयुक्त (सुहस्ताः) अच्छे हाथोंवाले (ऋभवः) बुद्धिमान् जनो ! जैसे मित्र वैसे आप लोग (चमसम्) यज्ञ सिद्ध करानेवाले पात्र के सदृश कार्य्य को (चतुर्धा) चार प्रकार (वि) विशेषता से (अकृणोत) करो और शास्त्रों का (वि) विशेष करके (अब्रवीत) उपदेश देओ। (अथ) इसके अनन्तर (इति) इस प्रकार से (देवानाम्) विद्वानों के (गणम्) समूह को और (अमृतस्य) नाशरहित मोक्ष के (पन्थाम्) मार्ग को (ऐत) प्राप्त होओ ॥३॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! परमेश्वर आप लोगों के प्रति चार प्रकार के पुरुषार्थ को सिद्ध करो, ऐसा कहता है कि जो परस्पर मित्र होकर कार्य्य की सिद्धि के लिये प्रयत्न करो तो धर्म्म, अर्थ, काम और मोक्ष की सिद्धि आप लोगों को विना संशय प्राप्त होवे ॥३॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥