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Rigveda Mandal 4 / Sukta 35 / Mantra 1

58 Sukta
9 Mantra
4/35/1
Devata- ऋभवः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
इ॒होप॑ यात शवसो नपातः॒ सौध॑न्वना ऋभवो॒ माप॑ भूत। अ॒स्मिन्हि वः॒ सव॑ने रत्न॒धेयं॒ गम॒न्त्विन्द्र॒मनु॑ वो॒ मदा॑सः ॥१॥

इ॒ह । उप॑ । या॒त॒ । श॒व॒सः॒ । न॒पा॒तः॒ । सौध॑न्वनाः । ऋ॒भ॒वः॒ । मा । अप॑ । भू॒त॒ । अ॒स्मिन् । हि । वः॒ । सव॑ने । र॒त्न॒ऽधेय॑म् । गम॑न्तु । इन्द्र॑म् । अनु॑ । वः॒ । मदा॑सः ॥

Mantra without Swara
इहोप यात शवसो नपातः सौधन्वना ऋभवो माप भूत। अस्मिन्हि वः सवने रत्नधेयं गमन्त्विन्द्रमनु वो मदासः ॥

इह। उप। यात। शवसः। नपातः। सौधन्वनाः। ऋभवः। मा। अप। भूत। अस्मिन्। हि। वः। सवने। रत्नऽधेयम्। गमन्तु। इन्द्रम्। अनु। वः। मदासः ॥१॥

Ashtak » 3 Adhyay » 7 Varga » 5 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे (शवसः) प्रशंसा करने योग्य बलयुक्त (नपातः) पतनरहित अर्थात् हानि से रहित (सौधन्वनाः) सुन्दर धनुष् अन्तरिक्ष में स्थित जिनके उनके सम्बन्धी (ऋभवः) बुद्धिमानो ! आप लोग (इह) यहाँ (उप, यात) समीप में प्राप्त हूजिये (वः) आप लोगों के (अस्मिन्) इस (सवने) क्रियामय व्यवहार में (हि) जिस कारण (वः) आप लोगों के (मदासः) आनन्द (रत्नधेयम्) धन धरने के पात्ररूप (इन्द्रम्) परम ऐश्वर्य्य युक्त जन के (अनु, गमन्तु) पीछे जावें, इस कारण इसको प्राप्त होकर कहीं (मा) मत (अप, भूत) अपमान से युक्त हूजिये ॥१॥
Essence
जो लोग उत्साह से ऐश्वर्य्य की वृद्धि करने की इच्छा करते हैं, वे सब जगह सम्पूर्ण ऐश्वर्य्य को प्राप्त होकर सर्वत्र सत्कारयुक्त और जो आलस्ययुक्त होते हैं, वे दरिद्रपन से अभिभूत अर्थात् सदा तिरस्कृत होते हैं ॥१॥
Subject
अब नव ऋचावाले पैंतीसवें सूक्त का आरम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में विद्वान् के विषय को कहते हैं ॥