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Rigveda Mandal 4 / Sukta 34 / Mantra 7

58 Sukta
11 Mantra
4/34/7
Devata- ऋभवः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
स॒जोषा॑ इन्द्र॒ वरु॑णेन॒ सोमं॑ स॒जोषाः॑ पाहि गिर्वणो म॒रुद्भिः॑। अ॒ग्रे॒पाभि॑र्ऋतु॒पाभिः॑ स॒जोषाः॒ ग्रास्पत्नी॑भी रत्न॒धाभिः॑ स॒जोषाः॑ ॥७॥

स॒ऽजोषाः॑ । इ॒न्द्र॒ । वरु॑णेन । सोम॑म् । स॒ऽजोषाः॑ । पा॒हि॒ । गि॒र्व॒णः॒ । म॒रुत्ऽभिः॑ । अ॒ग्रे॒ऽपाभिः॑ । ऋ॒तु॒ऽपाभिः॑ । स॒ऽजोषाः॑ । ग्नाःपत्नी॑भिः । र॒त्न॒ऽधाभिः॑ । स॒ऽजोषाः॑ ॥

Mantra without Swara
सजोषा इन्द्र वरुणेन सोमं सजोषाः पाहि गिर्वणो मरुद्भिः। अग्रेपाभिर्ऋतुपाभिः सजोषाः ग्रास्पत्नीभी रत्नधाभिः सजोषाः ॥

सऽजोषाः। इन्द्र। वरुणेन। सोमम्। सऽजोषाः। पाहि। गिर्वणः। मरुत्ऽभिः। अग्रेऽपाभिः। ऋतुऽपाभिः। सऽजोषाः। ग्नाःपत्नीभिः। रत्नऽधाभिः। सऽजोषाः ॥७॥

Ashtak » 3 Adhyay » 7 Varga » 4 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे (गिर्वणः) वाणियों से स्तुति किये (इन्द्र) ऐश्वर्य्य के देनेवाले ! आप (वरुणेन) श्रेष्ठ पुरुषार्थ से (सजोषाः) तुल्य प्रीति के सेवनेवाले (सोमम्) ऐश्वर्य्य की (पाहि) रक्षा करो और (अग्रेपाभिः) प्रथम रक्षा करनेवाले (मरुद्भिः) मनुष्यों के साथ (सजोषाः) तुल्य प्रीति सेवनेवाले हुए ऐश्वर्य्य की रक्षा करो और आप (रत्नधाभिः) द्रव्यों को धारण करनेवाली (ग्नास्पत्नीभिः) पतियों की स्त्रियों के साथ (सजोषाः) समान सेवनेवाले ऐश्वर्य्य की रक्षा करो और आप (ऋतुपाभिः) ऋतुओं में रक्षा करनेवालों के साथ (सजोषाः) समान सेवन करनेवाले ऐश्वर्य्य की रक्षा करो ॥७॥
Essence
हे मनुष्यो ! आप लोग श्रेष्ठ पुरुषों के मेल से ऐश्वर्य्य की उन्नति करो और जो विनाश से पहिले और ऋतुओं में रक्षा करते हैं और जो अपनी स्त्री पतिव्रता होती है, उन मनुष्यों और उस स्त्री के साथ तुल्य प्रीति, सुख-दुःख और लाभ का सेवन करते हुए सब के प्रिय होओ ॥७॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥