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Rigveda Mandal 4 / Sukta 34 / Mantra 3

58 Sukta
11 Mantra
4/34/3
Devata- ऋभवः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- स्वराट्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
अ॒यं वो॑ य॒ज्ञ ऋ॑भवोऽकारि॒ यमा म॑नु॒ष्वत्प्र॒दिवो॑ दधि॒ध्वे। प्र वोऽच्छा॑ जुजुषा॒णासो॑ अस्थु॒रभू॑त॒ विश्वे॑ अग्रि॒योत वा॑जाः ॥३॥

अ॒यम् । वः॒ । य॒ज्ञः । ऋ॒भ॒वः॒ । अ॒का॒रि॒ । यम् । आ । म॒नु॒ष्वत् । प्र॒ऽदिवः॑ । द॒धि॒ध्वे । प्र । वः॒ । अच्छ॑ । जु॒जु॒षा॒णासः॑ । अ॒स्थुः॒ । अभू॑त । विश्वे॑ । अ॒ग्रि॒या । उ॒त । वा॒जाः॒ ॥

Mantra without Swara
अयं वो यज्ञ ऋभवोऽकारि यमा मनुष्वत्प्रदिवो दधिध्वे। प्र वोऽच्छा जुजुषाणासो अस्थुरभूत विश्वे अग्रियोत वाजाः ॥

अयम्। वः। यज्ञः। ऋभवः। अकारि। यम्। आ। मनुष्वत्। प्रऽदिवः। दधिध्वे। प्र। वः। अच्छ। जुजुषाणासः। अस्थुः। अभूत। विश्वे। अग्रिया। उत। वाजाः ॥३॥

Ashtak » 3 Adhyay » 7 Varga » 3 Mantra » 3

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Meaning
हे (ऋभवः) बुद्धिमानो ! विद्वानों से जो (अयम्) यह (वः) आप लोगों का (यज्ञः) पढ़ाना और उपदेश करना रूप यज्ञ (अकारि) किया जाता है (यम्) जिसको (मनुष्वत्) विचार करनेवाले विद्वानों के सदृश आप लोग (दधिध्वे) धारण करो और जो (प्रदिवः) अतिशय विद्या आदि उत्तम गुणों की कामना करते हुए (वः) आप लोगों की (अच्छा) उत्तम प्रकार (आ, जुजुषाणासः) अत्यन्त सेवा करते हुए (प्र, अस्थुः) उत्तम स्थित हूजिये (उत) और (विश्वे) सम्पूर्ण (अग्रिया) प्रथम उत्पन्न हुए (वाजाः) श्रेष्ठ कर्म्मों में वेग जो होवें, उनको आप लोग प्राप्त (अभूत) हूजिये ॥३॥
Essence
हे बुद्धिमान् विद्यार्थी जनो ! जो आप लोगों के लिये विद्या देवें, उनकी कपटरहित प्रीति से सेवा करो और जितेन्द्रिय होकर यथार्थ विद्या को प्राप्त होओ ॥३॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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