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Rigveda Mandal 4 / Sukta 34 / Mantra 11

58 Sukta
11 Mantra
4/34/11
Devata- ऋभवः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- स्वराट्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
नापा॑भूत॒ न वो॑ऽतीतृषा॒मानिः॑शस्ता ऋभवो य॒ज्ञे अ॒स्मिन्। समिन्द्रे॑ण॒ मद॑थ॒ सं म॒रुद्भिः॒ सं राज॑भी रत्न॒धेया॑य देवाः ॥११॥

न । अप॑ । अ॒भू॒त॒ । न । वः॒ । अ॒ती॒तृ॒षा॒म॒ । अनिः॑ऽशस्ताः । ऋ॒भ॒वः॒ । य॒ज्ञे । अ॒स्मिन् । सम् । इन्द्रे॑ण । मद॑थ । सम् । म॒रुत्ऽभिः॑ । सम् । राज॑ऽभिः । र॒त्न॒ऽधेया॑य । दे॒वाः॒ ॥

Mantra without Swara
नापाभूत न वोऽतीतृषामानिःशस्ता ऋभवो यज्ञे अस्मिन्। समिन्द्रेण मदथ सं मरुद्भिः सं राजभी रत्नधेयाय देवाः ॥

न। अप। अभूत। न। वः। अतीतृषाम। अनिःऽशस्ताः। ऋभवः। यज्ञे। अस्मिन्। सम्। इन्द्रेण। मदथ। सम्। मरुत्ऽभिः। सम्। राजऽभिः। रत्नऽधेयाय। देवाः ॥११॥

Ashtak » 3 Adhyay » 7 Varga » 4 Mantra » 6

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Meaning
हे (देवाः) विद्वान् और (ऋभवः) बुद्धिमानो ! (अनिःशस्ताः) निरन्तर प्रशंसा को प्राप्त आप लोग कहीं भी (न) नहीं (अप, अभूत) तिरस्कृत हूजिये और जैसे (अस्मिन्) इस (यज्ञे) राज्यपालन करने रूप यज्ञ में (वः) तुम लोगों को (न) नहीं (अतितृषाम) अतितृष्णा युक्त करें, वैसे इस में (इन्द्रेण) ऐश्वर्य्य के साथ (सम्, मदथ) आनन्द करो और (मरुद्भिः) उत्तम मनुष्यों के साथ (सम्) आनन्द करो और (राजभिः) राजा लोगों के साथ (रत्नधेयाय) जिसमें धन रक्खे जाते हैं उस कोश के लिये (सम्) आनन्द करो ॥११॥
Essence
जो लोभ आदि दोषों से रहित हुए राजा और प्रजाजनों के साथ मिल कर गृहाश्रम के व्यवहार की उन्नति करते हैं, वे कहीं तिरस्कृत नहीं होते हैं ॥११॥ इस सूक्त में मेधावी के गुण वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति है, यह जानना चाहिये ॥११॥ यह चौबीसवाँ सूक्त और चौथा वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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