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Rigveda Mandal 4 / Sukta 33 / Mantra 9

58 Sukta
11 Mantra
4/33/9
Devata- ऋभवः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- स्वराट्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
अपो॒ ह्ये॑षा॒मजु॑षन्त दे॒वा अ॒भि क्रत्वा॒ मन॑सा॒ दीध्या॑नाः। वाजो॑ दे॒वाना॑मभवत्सु॒कर्मेन्द्र॑स्य ऋभु॒क्षा वरु॑णस्य॒ विभ्वा॑ ॥९॥

अपः॑ । हि । ए॒षा॒म् । अजु॑षन्त । दे॒वाः । अ॒भि । क्रत्वा॑ । मन॑सा । दीध्या॑नाः । वाजः॑ । दे॒वाना॑म् । अ॒भ॒व॒त् । सु॒ऽकर्मा॑ । इन्द्र॑स्य । ऋ॒भु॒क्षाः । वरु॑णस्य । विऽभ्वा॑ ॥

Mantra without Swara
अपो ह्येषामजुषन्त देवा अभि क्रत्वा मनसा दीध्यानाः। वाजो देवानामभवत्सुकर्मेन्द्रस्य ऋभुक्षा वरुणस्य विभ्वा ॥

अपः। हि। एषाम्। अजुषन्त। देवाः। अभि। क्रत्वा। मनसा। दीध्यानाः। वाजः। देवानाम्। अभवत्। सुऽकर्मा। इन्द्रस्य। ऋभुक्षाः। वरुणस्य। विऽभ्वा ॥९॥

Ashtak » 3 Adhyay » 7 Varga » 2 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
जो (क्रत्वा) बुद्धि और (मनसा) विज्ञान से (दीध्यानाः) प्रकाशमान (देवाः) विद्वान् जन (हि) जिस कारण (एषाम्) इन पदार्थों को कार्य्यसिद्धि के लिये (अपः) विमान आदि के बनाने में साधक कर्म का (अभि, अजुषन्त) सब प्रकार सेवन करते हैं और (सुकर्मा) उत्तम कर्म करनेवाला (देवानाम्) विद्वानों (इन्द्रस्य) बिजुली आदि और (वरुणस्य) जल आदि की (विभ्वा) व्याप्ति से (वाजः) अन्न, आदि विद्वानों के मध्य में (ऋभुक्षाः) बड़ा (अभवत्) होता है, वे और वह श्रीमान् होते हैं ॥९॥
Essence
जो मनुष्य इस संसार में सृष्टिस्थ पदार्थों की उत्तम परीक्षा से संयोग और विभाग के द्वारा श्रेष्ठ पदार्थ और कार्य्यों को सिद्ध करते हैं, वे विद्वानों में श्रेष्ठ और अत्यन्त धनी होते हैं ॥९॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥