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Rigveda Mandal 4 / Sukta 33 / Mantra 6

58 Sukta
11 Mantra
4/33/6
Devata- ऋभवः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
स॒त्यमू॑चु॒र्नर॑ ए॒वा हि च॒क्रुरनु॑ स्व॒धामृ॒भवो॑ जग्मुरे॒ताम्। वि॒भ्राज॑मानांश्चम॒साँ अहे॒वावे॑न॒त्त्वष्टा॑ च॒तुरो॑ ददृ॒श्वान् ॥६॥

स॒त्यम् । ऊ॒चुः॒ । नरः॑ । ए॒व । हि । च॒क्रुः । अनु॑ । स्व॒धाम् । ऋ॒भवः॑ । ज॒ग्मुः॒ । ए॒ताम् । वि॒ऽभ्राज॑मानान् । च॒म॒सान् । अहा॑ऽइव । अवे॑नत् । त्वष्टा॑ । च॒तुरः॑ । द॒दृ॒श्वान् ॥

Mantra without Swara
सत्यमूचुर्नर एवा हि चक्रुरनु स्वधामृभवो जग्मुरेताम्। विभ्राजमानांश्चमसाँ अहेवावेनत्त्वष्टा चतुरो ददृश्वान् ॥

सत्यम्। ऊचुः। नरः। एव। हि। चक्रुः। अनु। स्वधाम्। ऋभवः। जग्मुः। एताम्। विऽभ्राजमानान्। चमसान्। अहाऽइव। अवेनत्। त्वष्टा। चतुरः। ददृश्वान् ॥६॥

Ashtak » 3 Adhyay » 7 Varga » 2 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
जैसे (ऋभवः) बुद्धिमान् जन (एताम्) इस (स्वधाम्) अन्न को (जग्मुः) प्राप्त होते हैं और यथार्थ वक्ताओं के आचरण को (अनु, चक्रुः) करें वैसे (एवा) ही (नरः) मनुष्य (सत्यम्) यथार्थ (ऊचुः) कहें और जो (हि) जिससे (त्वष्टा) जानने वाला (चतुरः) चार को (ददृश्वान्) देखनेवाला होवे वह (विभ्राजमानान्) प्रकाशित हुए (चमसान्) मेघों को (अहेव) दिनों के सदृश चार पदार्थों की (अवेनत्) कामना करता है ॥६॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है । मनुष्यों को चाहिये कि इस संसार में यथार्थवक्ताओं का अनुकरण करके जैसे क्रम से वर्त्ताव कर दिन वर्षा ऋतु को प्राप्त होते हैं, वैसे ही क्रम से कर्म, उपासना और ज्ञान, सत्यभाषण आदि को बढ़ा के धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को सिद्ध कराते हैं, यह जानें ॥६॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥