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Rigveda Mandal 4 / Sukta 33 / Mantra 5

58 Sukta
11 Mantra
4/33/5
Devata- ऋभवः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
ज्ये॒ष्ठ आ॑ह चम॒सा द्वा क॒रेति॒ कनी॑या॒न्त्रीन्कृ॑णवा॒मेत्या॑ह। क॒नि॒ष्ठ आ॑ह च॒तुर॑स्क॒रेति॒ त्वष्ट॑ ऋभव॒स्तत्प॑नय॒द्वचो॑ वः ॥५॥

ज्ये॒ष्ठः । आ॒ह॒ । च॒म॒सा । द्वा । क॒र॒ । इति॑ । कनी॑यान् । त्रीन् । कृ॒ण॒वा॒म॒ । इति॑ । आ॒ह॒ । क॒नि॒ष्ठः । आ॒ह॒ । च॒तुरः॑ । क॒र॒ । इति॑ । त्वष्टा॑ । ऋ॒भ॒वः॒ । तत् । प॒न॒य॒त् । वचः॑ । वः॒ ॥

Mantra without Swara
ज्येष्ठ आह चमसा द्वा करेति कनीयान्त्रीन्कृणवामेत्याह। कनिष्ठ आह चतुरस्करेति त्वष्ट ऋभवस्तत्पनयद्वचो वः ॥

ज्येष्ठः। आह। चमसा। द्वा। कर। इति। कनीयान्। त्रीन्। कृणवाम। इति। आह। कनिष्ठः। आह। चतुरः। कर। इति। त्वष्टा। ऋभवः। तत्। पनयत्। वचः। वः ॥५॥

Ashtak » 3 Adhyay » 7 Varga » 1 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे (ऋभवः) बुद्धिमानो ! जिस (वः) आपके (वचः) वचन की (त्वष्टा) शिक्षा देनेवाला (पनयत्) प्रशंसा करे (तत्) वह वचन (द्वा) दो (चमसा) चमसों को (कर) करे (इति) इस प्रकार से (ज्येष्ठः) प्रथम उत्पन्न हुआ (आह) कहता है (कनीयान्) पीछे उत्पन्न हुआ छोटा (त्रीन्) तीन को (कृणवाम) करे (इति) इस प्रकार से (आह) कहता है और (कनिष्ठः) कनिष्ठ अर्थात् छोटा (चतुरः) चार को (कर) करे (इति) इस प्रकार से (आह) कहता है ॥५॥
Essence
बन्धुजन विद्वान् होकर परस्पर वार्त्तालाप करें कि जैसे बड़ा आज्ञा करे, वैसे छोटा और जैसे छोटा कहे वैसा ही ज्येष्ठ आचरण करे। जैसे इस मन्त्र में (कनीयान्) यह कर्त्तृ पद एकवचनान्त और (कृणवाम) यह बहुवचनान्त क्रिया नहीं संगत होते हैं, ऐसा जनाना चाहिये अर्थात् अहं कर्त्ता की योग्यता में वयं कर्त्ता के पक्ष से योजना कर समझना चाहिये अथवा जैसे हम लोग परस्पर वार्त्तालाप करें, वैसे ही आप लोगों को भी परस्पर वार्त्तालाप करना चाहिये और जिस प्रकार सत्य और प्रशंसित वचन होवे, उसी प्रकार सब को बोलना चाहिये ॥५॥
Subject
अब मनुष्यगुणों को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥