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Rigveda Mandal 4 / Sukta 33 / Mantra 3

58 Sukta
11 Mantra
4/33/3
Devata- ऋभवः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
पुन॒र्ये च॒क्रुः पि॒तरा॒ युवा॑ना॒ सना॒ यूपे॑व जर॒णा शया॑ना। ते वाजो॒ विभ्वाँ॑ ऋ॒भुरिन्द्र॑वन्तो॒ मधु॑प्सरसो नोऽवन्तु य॒ज्ञम् ॥३॥

पुनः॑ । ये । च॒क्रुः । पि॒तरा॑ । युवा॑ना । सना॑ । यूपा॑ऽइव । ज॒र॒णा । शया॑ना । ते । वाजः॑ । विऽभ्वा॑ । ऋ॒भुः । इन्द्र॑वन्तः॑ । मधु॑ऽप्सरसः । नः॒ । अ॒व॒न्तु॒ । य॒ज्ञम् ॥

Mantra without Swara
पुनर्ये चक्रुः पितरा युवाना सना यूपेव जरणा शयाना। ते वाजो विभ्वाँ ऋभुरिन्द्रवन्तो मधुप्सरसो नोऽवन्तु यज्ञम् ॥

पुनः। ये। चक्रुः। पितरा। युवाना। सना। यूपाऽइव। जरणा। शयाना। ते। वाजः। विऽभ्वा। ऋभुः। इन्द्रऽवन्तः। मधुऽप्सरसः। नः। अवन्तु। यज्ञम् ॥३॥

Ashtak » 3 Adhyay » 7 Varga » 1 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
(ये) जो जन (जरणा) बुढ़ापे को प्राप्त (शयाना) सोते हुए (सना) उत्तम प्रकार सेवा करनेवाले (पितरा) माता-पिता को (युवाना) जवान (यूपेव) खम्भे के सदृश पुष्ट (पुनः) फिर (चक्रुः) करें (ते) वे (मधुप्सरसः) सुन्दर स्वरूप और (इन्द्रवन्तः) अत्यन्त ऐश्वर्य्य से युक्त होकर (नः) हम लोगों के (यज्ञम्) पढ़ने-पढ़ाने आदि कर्म्म की (अवन्तु) रक्षा करें, उस कर्म्म के संग से (विभ्वा) व्यापक जाने गये जगदीश्वर से (वाजः) ज्ञानवान् और (ऋभुः) विद्वान् मैं होऊँ ॥३॥
Essence
जो पितृजन अपने सन्तानों को अतिकाल पर्य्यन्त ब्रह्मचर्य्य से उत्तम स्वभाव और विद्यायुक्त करते हैं, वे उन सन्तानों की सेवा से फिर भी वृद्ध हुए युवावस्थावालों के सदृश होते हैं ॥३॥
Subject
फिर माता-पिता से शिक्षा विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥