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Rigveda Mandal 4 / Sukta 33 / Mantra 2

58 Sukta
11 Mantra
4/33/2
Devata- ऋभवः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
य॒दार॒मक्र॑न्नृ॒भवः॑ पि॒तृभ्यां॒ परि॑विष्टी वे॒षणा॑ दं॒सना॑भिः। आदिद्दे॒वाना॒मुप॑ स॒ख्यमा॑य॒न्धीरा॑सः पु॒ष्टिम॑वहन्म॒नायै॑ ॥२॥

य॒दा । अर॑म् । अक्र॑न् । ऋ॒भवः॑ । पि॒तृऽभ्या॑म् । परि॑ऽविष्टी । वे॒षणा॑ । दं॒सना॑भिः । आत् । इत् । दे॒वाना॑म् । उप॑ । स॒ख्यम् । आ॒य॒न् । धीरा॑सः । पु॒ष्टिम् । अ॒व॒ह॒न् । म॒नायै॑ ॥

Mantra without Swara
यदारमक्रन्नृभवः पितृभ्यां परिविष्टी वेषणा दंसनाभिः। आदिद्देवानामुप सख्यमायन्धीरासः पुष्टिमवहन्मनायै ॥

यदा। अरम्। अक्रन्। ऋभवः। पितृऽभ्याम्। परिऽविष्टी। वेषणा। दंसनाभिः। आत्। इत्। देवानाम्। उप। सख्यम्। आयन्। धीरासः। पुष्टिम्। अवहन्। मनायै ॥२॥

Ashtak » 3 Adhyay » 7 Varga » 1 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
(ऋभवः) बुद्धिमान् जन (यदा) जब (पितृभ्याम्) विद्वान् माता और पिता से (परिविष्टी) सब प्रकार विद्या को व्याप्त होता जिससे उस क्रिया और (वेषणा) व्याप्त पदार्थ से तथा (दंसनाभिः) उत्तम कर्मों से (देवानाम्) विद्वानों के (सख्यम्) मित्रपन को (अरम्) पूरा (अक्रन्) करते हैं (आत्, इत्) तभी वे (धीरासः) योग से युक्त ध्यानवाले (मनायै) मानने योग्य विद्या के लिये बुद्धि को (उप, आयन्) प्राप्त होते और (पुष्टिम्) सम्पूर्ण अवयवों की पुष्टि को (अवहन्) प्राप्त होते हैं ॥२॥
Essence
जो मनुष्य बाल्यावस्था में पाँचवें वर्ष से माता की शिक्षा और आठवें वर्ष से लेकर पिता की शिक्षा को और अड़तालीस वर्ष पर्य्यन्त आचार्य्य की शिक्षा को ग्रहण करते हैं, वे ही विद्वान्, बुद्धिमान्, धार्मिक, बहुत काल पर्य्यन्त जीवने और संसार के कल्याण करनेवाले होते हैं ॥२॥
Subject
अब माता पिता आदि के शिक्षा विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥