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Rigveda Mandal 4 / Sukta 33 / Mantra 11

58 Sukta
11 Mantra
4/33/11
Devata- ऋभवः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
इ॒दाह्नः॑ पी॒तिमु॒त वो॒ मदं॑ धु॒र्न ऋ॒ते श्रा॒न्तस्य॑ स॒ख्याय॑ दे॒वाः। ते नू॒नम॒स्मे ऋ॑भवो॒ वसू॑नि तृ॒तीये॑ अ॒स्मिन्त्सव॑ने दधात ॥११॥

इ॒दा । अह्नः॑ पी॒तिम् । उ॒त । वः॒ । मद॑म् । धुः॒ । न । ऋ॒ते । श्रा॒न्तस्य॑ । स॒ख्याय॑ । दे॒वाः । ते । नू॒नम् । अ॒स्मे इति॑ । ऋ॒भ॒वः॒ । वसू॑नि । तृ॒तीये॑ । अ॒स्मिन् । सव॑ने । द॒धा॒त॒ ॥

Mantra without Swara
इदाह्नः पीतिमुत वो मदं धुर्न ऋते श्रान्तस्य सख्याय देवाः। ते नूनमस्मे ऋभवो वसूनि तृतीये अस्मिन्त्सवने दधात ॥

इदा। अह्नः। पीतिम्। उत। वः। मदम्। धुः। न। ऋते। श्रान्तस्य। सख्याय। देवाः। ते। नूनम्। अस्मे। इति। ऋभवः। वसूनि। तृतीये। अस्मिन्। सवने। दधात ॥११॥

Ashtak » 3 Adhyay » 7 Varga » 2 Mantra » 6

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Meaning
हे (ऋभवः) बुद्धिमानो ! जो (देवाः) विद्वान् जन (वः) आप लोगों में से (अह्नः) दिन के मध्य में (पीतिम्) पान को (उत) और आप लोगों के (मदम्) आनन्द को (धुः) धारण करें (ते) वे (इदा) इस समय (श्रान्तस्य) तप से नष्ट हुआ है पाप जिसका उसकी सेवा के (ऋते) विना (सख्याय) मित्रपने के लिये (न) नहीं समर्थ होते हैं वे (अस्मिन्) इस (तृतीये) अन्त्य (सवने) श्रेष्ठ कर्म के निमित्त (अस्मे) हम लोगों में (वसूनि) धनों को (नूनम्) निश्चय युक्त (दधात) धारण करो ॥११॥
Essence
जो जन वर्त्तमान समय में यथार्थ पुरुषार्थ को करते हैं, वे धनपति होते हैं और जो विद्वानों के सङ्ग को नहीं करते हैं, वे धन से रहित हुए दारिद्र्य को भजते हैं ॥११॥ इस सूक्त में विद्वान् माता पिता और मनुष्यों के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की पिछिले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति है, यह जानना चाहिये ॥११॥ यह तेतीसवाँ सूक्त और द्वितीय वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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