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Rigveda Mandal 4 / Sukta 33 / Mantra 10

58 Sukta
11 Mantra
4/33/10
Devata- ऋभवः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
ये हरी॑ मे॒धयो॒क्था मद॑न्त॒ इन्द्रा॑य च॒क्रुः सु॒युजा॒ ये अश्वा॑। ते रा॒यस्पोषं॒ द्रवि॑णान्य॒स्मे ध॒त्त ऋ॑भवः क्षेम॒यन्तो॒ न मि॒त्रम् ॥१०॥

ये । हरी॒ इति॑ । मे॒धया॑ । उ॒क्था । मद॑न्तः । इन्द्रा॑य । च॒क्रुः । सु॒ऽयुजा॑ । ये । अश्वा॑ । ते । रा॒यः । पोष॑म् । द्रवि॑णानि । अ॒स्मे इति॑ । ध॒त्त । ऋ॒भ॒वः॒ । क्षे॒म॒ऽयन्तः॑ । न । मि॒त्रम् ॥

Mantra without Swara
ये हरी मेधयोक्था मदन्त इन्द्राय चक्रुः सुयुजा ये अश्वा। ते रायस्पोषं द्रविणान्यस्मे धत्त ऋभवः क्षेमयन्तो न मित्रम् ॥

ये। हरी इति। मेधया। उक्था। मदन्तः। इन्द्राय। चक्रुः। सुऽयुजा। ये अश्वा। ते। रायः। पोषम्। द्रविणानि। अस्मे इति। धत्त। ऋभवः। क्षेमऽयन्तः। न। मित्रम् ॥१०॥

Ashtak » 3 Adhyay » 7 Varga » 2 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे (ऋभवः) बुद्धिमानो ! (ये) जो (मेधया) बुद्धि (उक्था) और प्रशंसाओं से (मदन्तः) आनन्द करते हुए (इन्द्राय) ऐश्वर्य्य के लिये (हरी) घोड़ों के सदृश अग्नि और जल को (अश्वा) शीघ्र चलनेवाले और (सुयुजा) उत्तम प्रकार जुड़े हुए (चक्रुः) करते हैं और (ये) जो इस विद्या को जानें (ते) वे आप लोग (मित्रम्) मित्र की (क्षेमयन्तः) रक्षा करते हुए के (न) सदृश (अस्मे) हम लोगों के निमित्त (रायः, पोषम्) धन आदि की पुष्टि को (द्रविणानि) तथा द्रव्यों वा यशों को (धत्त) धारण करो ॥१०॥
Essence
हे विद्वानो ! आप लोग सृष्टि के क्रम से पदार्थविद्याओं को प्राप्त होकर अन्य जनों को बोध कराय के अपने सदृश करके धनाढ्य करो ॥१०॥
Subject
फिर विद्वद्विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥