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Rigveda Mandal 4 / Sukta 33 / Mantra 1

58 Sukta
11 Mantra
4/33/1
Devata- ऋभवः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- भुरिक्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
प्र ऋ॒भुभ्यो॑ दू॒तमि॑व॒ वाच॑मिष्य उप॒स्तिरे॒ श्वैत॑रीं धे॒नुमी॑ळे। ये वात॑जूतास्त॒रणि॑भि॒रेवैः॒ परि॒ द्यां स॒द्यो अ॒पसो॑ बभू॒वुः ॥१॥

प्र । ऋ॒भुऽभ्यः॑ । दू॒तम्ऽइ॑व । वाच॑म् । इ॒ष्ये॒ । उ॒प॒ऽस्तिरे॑ । श्वैत॑रीम् । धे॒नुम् । ई॒ळे॒ । ये । वात॑ऽजूताः । त॒रणि॑ऽभिः । एवैः॑ । परि॑ । द्याम् । स॒द्यः । अ॒पसः॑ । ब॒भू॒वुः ॥

Mantra without Swara
प्र ऋभुभ्यो दूतमिव वाचमिष्य उपस्तिरे श्वैतरीं धेनुमीळे। ये वातजूतास्तरणिभिरेवैः परि द्यां सद्यो अपसो बभूवुः ॥

प्र। ऋभुऽभ्यः। दूतम्ऽइव। वाचम्। इष्ये। उपऽस्तिरे। श्वैतरीम्। धेनुम्। ईळे। ये। वातऽजूताः। तरणिऽभिः। एवैः। परि। द्याम्। सद्यः। अपसः। बभूवुः ॥१॥

Ashtak » 3 Adhyay » 7 Varga » 1 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
(ये) जो (वातजूताः) वायु से उड़ाये गये त्रसरेणु आदि पदार्थ (एवैः) प्राप्त वेग आदि गुणों और (तरणिभिः) उत्तम प्रकार तैरने आदि क्रियाओं से (सद्यः) शीघ्र (द्याम्) आकाश और (अपसः) कर्मों के प्रति (परिबभूवुः) परिभूत तिरस्कृत अर्थात् रूपान्तर को प्राप्त होते हैं, उनसे मैं (उपस्तिरे) विस्तार के अर्थ और (ऋभुभ्यः) बुद्धिमानों के लिये (दूतमिव) जैसे दूत दूतपन की इच्छा करे वैसे (श्वैतरीम्) अत्यन्त शुद्ध (धेनुम्) धारण करनेवाली (वाचम्) वाणी को (प्र, इष्ये) प्राप्त करता हूँ, उस वाणी से पदार्थ विज्ञान की (ईळे) स्तुति करता हूँ ॥१॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है । जो पुरुष जैसे त्रसरेणु वायु से क्रिया को निरन्तर करते हैं, वैसे ही विद्वानों से विद्या को प्राप्त होकर पुरुषार्थ सदा करते हैं, वे सर्व विद्याओं से युक्त सुन्दर वाणी को प्राप्त होते हैं ॥१॥
Subject
अब ग्यारह ऋचावाले तेंतीसवें सूक्त का प्रारम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में विद्वान् के विषय को कहते हैं ॥