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Rigveda Mandal 4 / Sukta 32 / Mantra 9

58 Sukta
24 Mantra
4/32/9
Devata- इन्द्र: Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अ॒भि त्वा॒ गोत॑मा गि॒रानू॑षत॒ प्र दा॒वने॑। इन्द्र॒ वाजा॑य॒ घृष्व॑ये ॥९॥

अ॒भि । त्वा॒ । गोत॑माः । गि॒रा । अनू॑षत । प्र । दा॒वने॑ । इन्द्र॑ । वाजा॑य । घृष्व॑ये ॥

Mantra without Swara
अभि त्वा गोतमा गिरानूषत प्र दावने। इन्द्र वाजाय घृष्वये ॥

अभि। त्वा। गोतमाः। गिरा। अनूषत। प्र। दावने। इन्द्र। वाजाय। घृष्वये ॥९॥

Ashtak » 3 Adhyay » 6 Varga » 28 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे (इन्द्र) राजन् ! (गोतमाः) श्रेष्ठ वाणी से युक्त जन (गिरा) वाणी से (त्वा) आपकी (अभि, अनूषत) सब ओर से स्तुति करें (वाजाय) विज्ञान और अन्न आदि के (घृष्वये) घिसे अर्थात् शुद्ध और (दावने) देनेवाले के लिये (प्र) उत्तम प्रकार स्तुति करें, उनकी आप प्रशंसा करो ॥९॥
Essence
जिसकी प्रशंसा विद्वान् जन करते हैं, वही प्रशंसित मानने के योग्य है ॥९॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥