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Rigveda Mandal 4 / Sukta 32 / Mantra 7

58 Sukta
24 Mantra
4/32/7
Devata- इन्द्र: Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- विराड्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
त्वं ह्येक॒ ईशि॑ष॒ इन्द्र॒ वाज॑स्य॒ गोम॑तः। स नो॑ यन्धि म॒हीमिष॑म् ॥७॥

त्वम् । हि । एकः॑ । ईशि॑षे । इन्द्र॑ । वाज॑स्य । गोऽम॑तः । सः । नः॒ । य॒न्धि॒ । म॒हीम् । इष॑म् ॥

Mantra without Swara
त्वं ह्येक ईशिष इन्द्र वाजस्य गोमतः। स नो यन्धि महीमिषम् ॥

त्वम्। हि। एकः। ईशिषे। इन्द्र। वाजस्य। गोऽमतः। सः। नः। यन्धि। महीम्। इषम् ॥७॥

Ashtak » 3 Adhyay » 6 Varga » 28 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे (इन्द्र) अत्यन्त ऐश्वर्य से युक्त विद्वान् जो (हि) जिससे (एकः) सहायरहित (त्वम्) आप (गोमतः) बहुत प्रकार की पृथिवी आदि के सहित (वाजस्य) विज्ञान आदि से युक्त जनसमूह के (ईशिषे) स्वामी हो (सः) वह (नः) हम लोगों के लिये (महीम्) बड़े (इषम्) अन्न आदि को (यन्धि) दीजिये ॥७॥
Essence
जो विद्वान् पुरुषार्थ से बड़े ऐश्वर्य्य को प्राप्त होकर अन्य जनों के लिये देता है, वही सब का ईश्वर होता है ॥७॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥