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Rigveda Mandal 4 / Sukta 32 / Mantra 3

58 Sukta
24 Mantra
4/32/3
Devata- इन्द्र: Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- निचृद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
द॒भ्रेभि॑श्चि॒च्छशी॑यांसं॒ हंसि॒ व्राध॑न्त॒मोज॑सा। सखि॑भि॒र्ये त्वे सचा॑ ॥३॥

द॒भ्रेभिः॑ । चि॒त् । शशी॑यांसम् । हंसि॑ । व्राध॑न्तम् । ओज॑सा । सखि॑ऽभिः । ये । त्वे इति॑ । सचा॑ ॥

Mantra without Swara
दभ्रेभिश्चिच्छशीयांसं हंसि व्राधन्तमोजसा। सखिभिर्ये त्वे सचा ॥

दभ्रेभिः। चित्। शशीयांसम्। हंसि। व्राधन्तम्। ओजसा। सखिऽभिः। ये। त्वे इति। सचा ॥३॥

Ashtak » 3 Adhyay » 6 Varga » 27 Mantra » 3

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Meaning
हे सेनापति राजन् ! जो आप (दभ्रेभिः) थोड़े वा छोटे (सखिभिः) मित्रों से (चित्) भी (ओजसा) बल से (शशीयांसम्) धर्म्म के उल्लङ्घन करने और (व्राधन्तम्) बहिलिये के सदृश प्रजा के नाश करनेवाले का (हंसि) नाश करते हो और (ये) जो (त्वे) आप में (सचा) सत्य से वर्त्तमान हैं, उनकी रक्षा करते हो तो विजय को कैसे न प्राप्त होते हो ॥३॥
Essence
जो धार्मिक थोड़े भी परस्पर मित्र होकर शत्रुओं के साथ युद्ध करें तो बहुत अधर्म्माचारियों को जीतें ॥३॥
Subject
फिर उसी राजप्रजाविषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥