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Rigveda Mandal 4 / Sukta 32 / Mantra 24

58 Sukta
24 Mantra
4/32/24
Devata- इन्द्राश्वौ Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- स्वराडार्चीगायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अरं॑ म उ॒स्रया॒म्णेऽर॒मनु॑स्रयाम्णे। ब॒भ्रू यामे॑ष्व॒स्रिधा॑ ॥२४॥

अर॑म् । मे॒ । उ॒स्रऽया॑म्णे । अर॑म् । अनु॑स्रऽयाम्ने । ब॒भ्रू इति॑ । यामे॑षु । अ॒स्रिधा॑ ॥

Mantra without Swara
अरं म उस्रयाम्णेऽरमनुस्रयाम्णे। बभ्रू यामेष्वस्रिधा ॥

अरम्। मे। उस्रऽयाम्ने। अरम्। अनुस्रऽयाम्ने। बभ्रू इति। यामेषु। अस्रिधा ॥२४॥

Ashtak » 3 Adhyay » 6 Varga » 30 Mantra » 8

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1 Bhashyas
Meaning
जो (अस्रिधा) नहीं हिंसा करने (बभ्रू) और सत्य की धारणा करनेवाले (यामेषु) प्रहरों में (उस्रयाम्णे) किरणों के समान जो यान से जाता उस (मे) मेरे लिये (अरम्) समर्थ और (अनुस्रयाम्णे) शीत देश को जानेवाले मेरे लिये (अरम्) समर्थ होते हैं, वे मुझसे सेवन योग्य हैं ॥२४॥
Essence
जो अध्यापक और उपदेशक शीतोष्ण देश निवासी मुझको पढ़ा और उपदेश दे सकते हैं, वे सदैव मुझ से सत्कार करने योग्य होते हैं ॥२४॥ इस सूक्त में इन्द्र राजा प्रजा अध्यापक और उपदेशक के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥२४॥ यह ऋग्वेद संहिता के तीसरे अष्टक में छठा अध्याय तीसवाँ वर्ग तथा चतुर्थ मण्डल में बत्तीसवाँ सूक्त और तीसरा अनुवाक पूरा हुआ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥