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Rigveda Mandal 4 / Sukta 32 / Mantra 23

58 Sukta
24 Mantra
4/32/23
Devata- इन्द्राश्वौ Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
क॒नी॒न॒केव॑ विद्र॒धे नवे॑ द्रुप॒दे अ॑र्भ॒के। ब॒भ्रू यामे॑षु शोभेते ॥२३॥

क॒नी॒न॒काऽइ॑व । वि॒द्र॒धे । नवे॑ । द्रु॒ऽप॒दे । अ॒र्भ॒के । ब॒भ्रू इति॑ । यामे॑षु । शो॒भे॒ते॒ इति॑ ॥

Mantra without Swara
कनीनकेव विद्रधे नवे द्रुपदे अर्भके। बभ्रू यामेषु शोभेते ॥

कनीनकाऽइव। विद्रधे। नवे। द्रुऽपदे। अर्भके। बभ्रू इति। यामेषु। शोभेते इति ॥२३॥

Ashtak » 3 Adhyay » 6 Varga » 30 Mantra » 7

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Meaning
हे विद्वानो ! आप जो (बभ्रू) अध्यापक और उपदेशक (यामेषु) प्रहरों में (कनीनकेव) सुन्दर के तुल्य (नवे) नवीन (विद्रधे) विशेष दृढ़ (द्रुपदे) शीघ्र प्राप्त होने योग्य पदार्थ वा वृक्ष आदि द्रव्यों के स्थान और (अर्भके) छोटे बालक के निमित्त (शोभेते) शोभित होते हैं, उनके सदृश संसार के उपकार करनेवाले होने को योग्य हों ॥२३॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है । जो विद्वान् अधिक वा न्यून विज्ञान में वा काम में सुशोभित हों, वे जगत् के बीच कल्याण करनेवाले हों ॥२३॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥