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Rigveda Mandal 4 / Sukta 32 / Mantra 22

58 Sukta
24 Mantra
4/32/22
Devata- इन्द्र: Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
प्र ते॑ ब॒भ्रू वि॑चक्षण॒ शंसा॑मि गोषणो नपात्। माभ्यां॒ गा अनु॑ शिश्रथः ॥२२॥

प्र । ते॒ । ब॒भ्रू इति॑ । वि॒ऽच॒क्ष॒ण॒ । शंसा॑मि । गो॒ऽस॒णः॒ । न॒पा॒त् । मा । आ॒भ्या॒म् । गाः । अनु॑ । शि॒श्र॒थः॒ ॥

Mantra without Swara
प्र ते बभ्रू विचक्षण शंसामि गोषणो नपात्। माभ्यां गा अनु शिश्रथः ॥

प्र। ते। बभ्रू इति। विऽचक्षण। शंसामि। गोऽसनः। नपात्। मा। आभ्याम्। गाः। अनु। शिश्रथः ॥२२॥

Ashtak » 3 Adhyay » 6 Varga » 30 Mantra » 6

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Meaning
हे (गोषणः) गौ माँगनेवाले (विचक्षण) उत्तम ज्ञाता ! जो (बभ्रू) सम्पूर्ण विद्याओं के धारण करनेवाले अध्यापक और उपदेशक की मैं (प्र, शंसामि) प्रशंसा करता हूँ वे (ते) आपके शिक्षक होवें (आभ्याम्) इनके साथ आप (नपात्) नहीं गिरनेवाले होते हुए (गाः) पृथिव्यादिकों को (मा) मत (अनु, शिश्रथः) शिथिल करते हैं ॥२२॥
Essence
हे जिज्ञासु ज्ञान को चाहनेवाले ! तू अध्यापक और उपदेशक को पाकर पुरुषार्थ से विद्या और उपदेश को शीघ्र ग्रहण कर, आलस्य मत कर ॥२२॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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