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Rigveda Mandal 4 / Sukta 32 / Mantra 16

58 Sukta
24 Mantra
4/32/16
Devata- इन्द्र: Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
पु॒रो॒ळाशं॑ च नो॒ घसो॑ जो॒षया॑से॒ गिर॑श्च नः। व॒धू॒युरि॑व॒ योष॑णाम् ॥१६॥

पु॒रो॒ळास॑म् । च॒ । नः॒ । घसः॑ । जो॒षया॑से । गिरः॑ । च॒ । नः॒ । व॒धू॒युःऽइ॑व । योष॑णाम् ॥

Mantra without Swara
पुरोळाशं च नो घसो जोषयासे गिरश्च नः। वधूयुरिव योषणाम् ॥

पुरोळाशम्। च। नः। घसः। जोषयासे। गिरः। च। नः। वधूयुःऽइव। योषणाम् ॥१६॥

Ashtak » 3 Adhyay » 6 Varga » 29 Mantra » 6

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1 Bhashyas
Meaning
हे वैद्यराज ! जो (नः) हम लोगों के लिये (घसः) भोग है उसकी (पुरोळाशम्, च) और उत्तम प्रकार संस्कारयुक्त अन्नविशेष की (जोषयासे) सेवा कराओ और (योषणाम्) स्त्री को (वधूयुरिव) वधूयु अर्थात् अपने को वधू की चाहना करनेवाली के सदृश (नः) हम लोगों को (गिरः) वाणियों की (च) भी सेवा कराओ ॥१६॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है । हे मनुष्यो ! जो राजा स्त्री की कामना करते हुए पति के सदृश प्रजा की वाणियों को सुन के न्याय करता और ऐश्वर्य को धारण करता है, वह राज्य में पूज्य होता है ॥१६॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥