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Rigveda Mandal 4 / Sukta 32 / Mantra 14

58 Sukta
24 Mantra
4/32/14
Devata- इन्द्र: Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अ॒र्वा॒ची॒नो व॑सो भवा॒स्मे सु म॒त्स्वान्ध॑सः। सोमा॑नामिन्द्र सोमपाः ॥१४॥

अ॒र्वा॒ची॒नः । व॒सो॒ इति॑ । भ॒व॒ । अ॒स्मे इति॑ । सु । म॒त्स्व॒ । अन्ध॑सः । सोमा॑नाम् । इ॒न्द्र॒ । सो॒म॒ऽपाः॒ ॥

Mantra without Swara
अर्वाचीनो वसो भवास्मे सु मत्स्वान्धसः। सोमानामिन्द्र सोमपाः ॥

अर्वाचीनः। वसो इति। भव। अस्मे इति। सु। मत्स्व। अन्धसः। सोमानाम्। इन्द्र। सोमऽपाः ॥१४॥

Ashtak » 3 Adhyay » 6 Varga » 29 Mantra » 4

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Meaning
हे (वसो) वास करनेवाले (इन्द्र) राजन् ! (अर्वाचीनः) इस काल में वर्त्तमान (सोमपाः) ऐश्वर्य्य की रक्षा करनेवाले आप (अस्मे) हम लोगों में (अन्धसः) अन्न आदि और (सोमानाम्) अन्य पदार्थों के रक्षक (भव) हूजिये और (सु, मत्स्व) उत्तम प्रकार आनन्द कीजिये ॥१४॥
Essence
जो राजा प्रजा के पदार्थों की यथायोग्य रक्षा करे, वह आगे के समय में सुख की वृद्धियुक्त होवे ॥१४॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥