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Rigveda Mandal 4 / Sukta 32 / Mantra 13

58 Sukta
24 Mantra
4/32/13
Devata- इन्द्र: Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- निचृद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
यच्चि॒द्धि शश्व॑ता॒मसीन्द्र॒ साधा॑रण॒स्त्वम्। तं त्वा॑ व॒यं ह॑वामहे ॥१३॥

यत् । चि॒त् । हि । शश्व॑ताम् । असि॑ । इन्द्र॑ । साधा॑रणः । त्वम् । तम् । त्वा॒ । व॒यम् । हा॒वा॒म॒हे॒ ॥

Mantra without Swara
यच्चिद्धि शश्वतामसीन्द्र साधारणस्त्वम्। तं त्वा वयं हवामहे ॥

यत्। चित्। हि। शश्वताम्। असि। इन्द्र। साधारणः। त्वम्। तम्। त्वा। वयम्। हवामहे ॥१३॥

Ashtak » 3 Adhyay » 6 Varga » 29 Mantra » 3

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Meaning
हे (इन्द्र) अत्यन्त ऐश्वर्य से युक्त जगदीश्वर ! (यत्) जो (त्वम्) आप (शश्वताम्) अनादि काल से हुए प्रकृति आदि पदार्थों के मध्य में (साधारणः) सामान्य से व्याप्त (असि) होते हो (तम्, चित्) उन्हीं (त्वा) आपकी (हि) निश्चय (वयम्) हम लोग (हवामहे) स्तुति करते वा आपका आश्रय करते हैं ॥१३॥
Essence
हे मनुष्यो ! जो परमेश्वर अनादि काल से सिद्ध प्रकृति आदि पदार्थों का स्वामी, उनका धारण करनेवाला, वह कार्य्य का निर्माणकर्ता और कार्य्यों की व्यवस्था करनेवाला अन्तर्यामी है, उसी की सदा उपासना करो ॥१३॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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