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Rigveda Mandal 4 / Sukta 32 / Mantra 12

58 Sukta
24 Mantra
4/32/12
Devata- इन्द्र: Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- निचृद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अवी॑वृधन्त॒ गोत॑मा॒ इन्द्र॒ त्वे स्तोम॑वाहसः। ऐषु॑ धा वी॒रव॒द्यशः॑ ॥१२॥

अवी॑वृधन्त । गोत॑माः । इन्द्र॑ । त्वे इति॑ । स्तोम॑ऽवाहसः । आ । ए॒षु॒ । धाः॒ । वी॒रऽव॑त् । यशः॑ ॥

Mantra without Swara
अवीवृधन्त गोतमा इन्द्र त्वे स्तोमवाहसः। ऐषु धा वीरवद्यशः ॥

अवीवृधन्त। गोतमाः। इन्द्र। त्वे इति। स्तोमऽवाहसः। आ। एषु। धाः। वीरऽवत्। यशः ॥१२॥

Ashtak » 3 Adhyay » 6 Varga » 29 Mantra » 2

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Meaning
हे (इन्द्र) विद्वन् जो (स्तोमवाहसः) प्रशंसा को प्राप्त करानेवाले (गोतमाः) विद्वान् जन (त्वे) आप में (वीरवत्) वीर पुरुष जिसमें विद्यमान उस (यशः) कीर्ति वा धन को (अवीवृधन्त) बढ़ावें (एषु) इनमें आप वीरयुक्त कीर्ति वा धन को (आ, धाः) अच्छे प्रकार धारण कीजिये ॥१२॥
Essence
हे राजन् ! जो लोग उत्तम कर्म्म से आपकी कीर्ति को बढ़ावें, उनकी कीर्ति आप भी बढ़ाइये ॥१२॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥