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Rigveda Mandal 4 / Sukta 32 / Mantra 11

58 Sukta
24 Mantra
4/32/11
Devata- इन्द्र: Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- पिपीलिकामध्यागायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
ता ते॑ गृणन्ति वे॒धसो॒ यानि॑ च॒कर्थ॒ पौंस्या॑। सु॒तेष्वि॑न्द्र गिर्वणः ॥११॥

ता । ते॒ । गृ॒ण॒न्ति॒ । वे॒धसः॑ । यानि॑ । च॒कर्थ॑ । पौंस्या॑ । सु॒तेषु॑ । इ॒न्द्र॒ । गि॒र्व॒णः॒ ॥

Mantra without Swara
ता ते गृणन्ति वेधसो यानि चकर्थ पौंस्या। सुतेष्विन्द्र गिर्वणः ॥

ता। ते। गृणन्ति। वेधसः। यानि। चकर्थ। पौंस्या। सुतेषु। इन्द्र। गिर्वणः ॥११॥

Ashtak » 3 Adhyay » 6 Varga » 29 Mantra » 1

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Meaning
हे (गिर्वणः) वाणियों से स्तुति किये गये (इन्द्र) राजन् ! (यानि) जो (वेधसः) बुद्धिमान् (ते) आपके (पौंस्या) पुरुषों के लिये हितकारक बलों को (गृणन्ति) कहते हैं और जिनको आप (सुतेषु) उत्पन्न पदार्थों में (चकर्थ) करते हो (ता) उनकी हम लोग प्रशंसा करें ॥११॥
Essence
वे ही प्रशंसा करने योग्य कर्म्म होते हैं कि जिनकी यथार्थवक्ता जन प्रशंसा करें ॥११॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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