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Rigveda Mandal 4 / Sukta 32 / Mantra 10

58 Sukta
24 Mantra
4/32/10
Devata- इन्द्र: Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
प्र ते॑ वोचाम वी॒र्या॒३॒॑ या म॑न्दसा॒न आरु॑जः। पुरो॒ दासी॑र॒भीत्य॑ ॥१०॥

प्र । ते॒ । वो॒चा॒म॒ । वी॒र्या॑ । याः । म॒न्द॒स॒नः । आ । अरु॑जः । पुरः॑ । दासीः॑ । अ॒भि॒ऽइत्य॑ ॥

Mantra without Swara
प्र ते वोचाम वीर्या३ या मन्दसान आरुजः। पुरो दासीरभीत्य ॥

प्र। ते। वोचाम। वीर्या। याः। मन्दसानः। आ। अरुजः। पुरः। दासीः। अभिऽइत्य ॥१०॥

Ashtak » 3 Adhyay » 6 Varga » 28 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे राजन् ! (मन्दसानः) कामना करते हुए आप शत्रुओं की (याः) जो (दासीः) सेविकाओं के सदृश (आ, अरुजः) सब प्रकार रोगयुक्त (पुरः) नगरियों को (अभीत्य) सब ओर से प्राप्त होकर जीतते हो उन (ते) आपके (वीर्य्या) बल, पराक्रम से युक्त कर्म्मों का हम लोग (प्र, वोचाम) उपदेश करें ॥१०॥
Essence
जो राजा शत्रुओं का पराजय कर सके, वही राज्य करने को योग्य हो ॥१०॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥