Available Bhashyas

Bhashyas

Choose the bhashyas to show on this mantra page.

Rigveda Mandal 4 / Sukta 32 / Mantra 1

58 Sukta
24 Mantra
4/32/1
Devata- इन्द्र: Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
आ तू न॑ इन्द्र वृत्रहन्न॒स्माक॑म॒र्धमा ग॑हि। म॒हान्म॒हीभि॑रू॒तिभिः॑ ॥१॥

आ । तु । नः॒ । इ॒न्द्र॒ । वृ॒त्र॒ऽह॒न् । अ॒स्माक॑म् । अ॒र्धम् । आ । ग॒हि॒ । म॒हान् । म॒हीभिः॑ । ऊ॒तिऽभिः॑ ॥

Mantra without Swara
आ तू न इन्द्र वृत्रहन्नस्माकमर्धमा गहि। महान्महीभिरूतिभिः ॥

आ। तु। नः। इन्द्र। वृत्रऽहन्। अस्माकम्। अर्धम्। आ। गहि। महान्। महीभिः। ऊतिऽभिः ॥१॥

Ashtak » 3 Adhyay » 6 Varga » 27 Mantra » 1

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
हे (वृत्रहन्) मेघ को नाश करनेवाले सूर्य के सदृश (इन्द्र) राजन् ! आप (अस्माकम्) हम लोगों की (अर्द्धम्) वृद्धि को (आ, गहि) प्राप्त हूजिये और (महीभिः) बड़ी (ऊतिभिः) ऊतियों अर्थात् रक्षादिकों के साथ (महान्) बढ़े हुए (नः) हम लोगों को (तु) फिर (आ) प्राप्त होओ ॥१॥
Essence
हे राजन् ! जो आप हम लोगों की वृद्धि करें तो हम लोग आपकी अतिवृद्धि करें ॥१॥
Subject
अब चौबीस ऋचावाले बत्तीसवें सूक्त का आरम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में इन्द्रपदवाच्य राजप्रजागुणों को कहते हैं ॥