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Rigveda Mandal 4 / Sukta 31 / Mantra 9

58 Sukta
15 Mantra
4/31/9
Devata- इन्द्र: Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
न॒हि ष्मा॑ ते श॒तं च॒न राधो॒ वर॑न्त आ॒मुरः॑। न च्यौ॒त्नानि॑ करिष्य॒तः ॥९॥

न॒हि । स्म॒ । ते॒ । श॒तम् । च॒न । राधः॑ । वर॑न्ते । आ॒ऽमुरः॑ । न । च्यौ॒त्नानि॑ । क॒रि॒ष्य॒तः ॥

Mantra without Swara
नहि ष्मा ते शतं चन राधो वरन्त आमुरः। न च्यौत्नानि करिष्यतः ॥

नहि। स्म। ते। शतम्। चन। राधः। वरन्ते। आऽमुरः। न। च्यौत्नानि। करिष्यतः ॥९॥

Ashtak » 3 Adhyay » 6 Varga » 25 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे राजन् ! (च्यौत्नानि) बलों को (करिष्यतः) करते हुए (ते) आपके (शतम्) असंख्य (राधः) धन को (चन) भी (आमुरः) सब प्रकार रोग करनेवाले (नहि) नहीं (वरन्ते) स्वीकार करते हैं (न) और न विजय को (स्म) ही प्राप्त होते हैं ॥९॥
Essence
हे राजन् ! जो आप यथायोग्य न्यायकारी होवें तो आपका धन और बल कभी न नष्ट होवे और सैकड़ों प्रकार बढ़े ॥९॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥