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Rigveda Mandal 4 / Sukta 31 / Mantra 8

58 Sukta
15 Mantra
4/31/8
Devata- इन्द्र: Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
उ॒त स्मा॑ स॒द्य इत्परि॑ शशमा॒नाय॑ सुन्व॒ते। पु॒रू चि॑न्मंहसे॒ वसु॑ ॥८॥

उ॒त । स्म॒ । स॒द्यः । इत् । परि॑ । श॒श॒मा॒नाय॑ । सु॒न्व॒ते । पु॒रु । चि॒त् । मं॒ह॒से॒ । वसु॑ ॥

Mantra without Swara
उत स्मा सद्य इत्परि शशमानाय सुन्वते। पुरू चिन्मंहसे वसु ॥

उत। स्म। सद्यः। इत्। परि। शशमानाय। सुन्वते। पुरु। चित्। मंहसे। वसु ॥८॥

Ashtak » 3 Adhyay » 6 Varga » 25 Mantra » 3

Bhashya

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Meaning
हे विद्वन् ! जिससे कि आप (शशमानाय) प्रशंसित और (सुन्वते) पुरुषार्थ से ओषधियों के रस को उत्पन्न करते हुए के लिये (चित्) भी (पुरू) बहुत (वसु) धन को (परि) सब प्रकार (मंहसे) बढ़वाते हो इससे आप (सद्यः) शीघ्र (उत) फिर (स्म) ही (इत्) निश्चित ऐश्वर्य्य को प्राप्त होते हो ॥८॥
Essence
जो मनुष्य यथार्थवक्ता पुरुषों का सत्कार करते हैं, वे शीघ्र गुणवान् होकर ऐश्वर्य्य से युक्त होवें ॥८॥
Subject
फिर न्यायपालन राजप्रजाधर्मविषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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