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Rigveda Mandal 4 / Sukta 31 / Mantra 5

58 Sukta
15 Mantra
4/31/5
Devata- इन्द्र: Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- विराड्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
प्र॒वता॒ हि क्रतू॑ना॒मा हा॑ प॒देव॒ गच्छ॑सि। अभ॑क्षि॒ सूर्ये॒ सचा॑ ॥५॥

प्र॒ऽवता॑ । हि । क्रतू॑नाम् । आ । ह॒ । प॒दाऽइ॑व । गच्छ॑सि । अभ॑क्षि । सूर्ये॑ । सचा॑ ॥

Mantra without Swara
प्रवता हि क्रतूनामा हा पदेव गच्छसि। अभक्षि सूर्ये सचा ॥

प्रऽवता। हि। क्रतूनाम्। आ। ह। पदाऽइव। गच्छसि। अभक्षि। सूर्ये। सचा ॥५॥

Ashtak » 3 Adhyay » 6 Varga » 24 Mantra » 5

Bhashya

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Meaning
हे राजन् ! आप (हि) जिससे (क्रतूनाम्) बुद्धि वा कर्म्मों के (प्रवता) नीचे मार्ग से (पदेव) पैरों के सदृश (आ, गच्छसि) आते हो इससे (ह) निश्चय वैसे ही (सचा) सत्य के साथ मैं (सूर्य्ये) सूर्य्ये में प्रकाश के सदृश धर्म्म का (अभक्षि) सेवन करता हूँ ॥५॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है । हे मनुष्यो ! जैसे श्रेष्ठ विद्वान् लोग शुद्ध मार्ग से जाकर पूर्ण बुद्धि को प्राप्त होते हैं, वैसा ही अन्य जन भी वर्त्ताव करके बुद्धि को प्राप्त हों ॥५॥
Subject
फिर राजप्रजाधर्मविषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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