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Rigveda Mandal 4 / Sukta 31 / Mantra 3

58 Sukta
15 Mantra
4/31/3
Devata- इन्द्र: Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- त्रिपाद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अ॒भी षु णः॒ सखी॑नामवि॒ता ज॑रितॄ॒णाम्। श॒तं भ॑वास्यू॒तिभिः॑ ॥३॥

अ॒भि । सु । नः॒ । सखी॑नाम् । अ॒वि॒ता । ज॒रि॒तॄ॒णाम् । श॒तम् । भ॒वा॒सि॒ । ऊ॒तिऽभिः॑ ॥

Mantra without Swara
अभी षु णः सखीनामविता जरितॄणाम्। शतं भवास्यूतिभिः ॥

अभि। सु। नः। सखीनाम्। अविता। जरितॄणाम्। शतम्। भवासि। ऊतिऽभिः ॥३॥

Ashtak » 3 Adhyay » 6 Varga » 24 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे राजन् ! जो आप (ऊतिभिः) रक्षणादिकों से (जरितॄणाम्) श्रेष्ठ विद्याओं के जाननेवाले (सखीनाम्) सब के मित्र (नः) हम लोगों के (शतम्) सैकड़े (भवासि) होते हो इससे (अभि) सम्मुख (सु) उत्तम प्रकार (अविता) रक्षक हूजिये ॥३॥
Essence
जो मनुष्य अपने आत्मा के सदृश सुख-दुःख, हानि और लाभ को औरों के भी जानकर दूसरे के प्रिय के लिये वर्त्ताव करें, उनमें अन्य जन भी मित्रता करें ॥३॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥