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Rigveda Mandal 4 / Sukta 31 / Mantra 2

58 Sukta
15 Mantra
4/31/2
Devata- इन्द्र: Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- निचृद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
कस्त्वा॑ स॒त्यो मदा॑नां॒ मंहि॑ष्ठो मत्स॒दन्ध॑सः। दृ॒ळ्हा चि॑दा॒रुजे॒ वसु॑ ॥२॥

कः । त्वा॒ । स॒त्यः । मदा॑नाम् । मंहि॑ष्ठः । म॒त्स॒त् । अन्ध॑सः । दृ॒ळ्हा । चि॒त् । आ॒ऽरुजे॑ । वसु॑ ॥

Mantra without Swara
कस्त्वा सत्यो मदानां मंहिष्ठो मत्सदन्धसः। दृळ्हा चिदारुजे वसु ॥

कः। त्वा। सत्यः। मदानाम्। मंहिष्ठः। मत्सत्। अन्धसः। दृळ्हा। चित्। आऽरुजे। वसु ॥२॥

Ashtak » 3 Adhyay » 6 Varga » 24 Mantra » 2

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Meaning
हे मनुष्य (मदानाम्) आनन्दों और (अन्धसः) अन्न आदि के सम्बन्ध में (मंहिष्ठः) अत्यन्त बड़ा (सत्यः) श्रेष्ठों में श्रेष्ठ (त्वा) आपको (मत्सत्) आनन्द देवे और (आरुजे) सब प्रकार से रोग के लिये (दृळ्हा) दृढ़ (वसु) धनरूप (चित्) भी (कः) कौन होवे अर्थात् रोग के दूर करने को अत्यन्त संलग्न कौन हो ॥२॥
Essence
जो मनुष्य ब्रह्मचर्य्य आदि धर्म्माचरण से यथायोग्य आहार और विहार करें तो उनमें कभी दारिद्र्य और रोग नहीं आवे ॥२॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥